गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

Chasing the footprints of Bhagwan Rama : Chitrakoot (Part-2)

Sati Anusuiya Mandir & Gupt Godavari Caves


इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करिये जहां आप जानकी कुण्ड और स्फ़टिक शिला के विषय में पढ़ सकते हैं !! ​

..............................तो मरफा जाना कैंसिल हो गया ! कभी कभी होता है कि जो हम चाहते हैं वो नहीं हो पाता , तो क्या हुआ ? हम अनसुइया मंदिर चलते हैं , वहां के लिए तो ऑटो / टेम्पो मिल ही जाते हैं ! मैं हालाँकि स्फटिक शिला से रोड पर आ गया था लेकिन अगर सती अनसुइया आश्रम की बात करें तो ये रामघाट से करीब 16 किलोमीटर दूर होगा और वहीँ से सती अनसुइया के लिए ऑटो टेम्पो मिल जाते हैं ! कउनु चिंता की बात नहीं ! मंदिर चलने से पहले महासती अनसुइया देवी के विषय में बात कर लेते हैं : 
सती अनसुइया को सतीत्व का एक रोल मॉडल कहना ज्यादा उचित होगा ! सती , जैसा कि नाम से परिलक्षित होता है , सदैव पतिव्रता रहीं ! अनुसुइया देवी सप्त ऋषियों में से एक ऋषि अत्रि मुनि की पत्नी थीं। तीनों देवता ब्रह्मा , विष्णु और शिव अपनी पत्नियों के सामने देवी अनसुइया के पतिव्रता धर्म का बखान करते रहते थे और नारद मुनि भी उनकी तारीफ करते थे तो जैसा कि स्वाभाविक है , तीनों देवियों को ईर्ष्या होती थी। तीनों देवियों ने ब्रह्मा , विष्णु और शिव को देवी अनसुइया की परीक्षा लेने के लिए दबाव बनाया और पत्नी के दबाव के आगे कौन टिक पाया है ? जो ये भगवान टिक पाते ! वैसे बड़ी रोचक बात है कि जो पूरी दुनिया को उँगलियों के इशारे पर नचाते हैं वो त्रिदेव , अपनी पत्नियों के इशारे पर नाचते हैं तो फिर हम तो सामान्य और साधारण इंसान ठहरे :)

तो जी बात ये तय हुई कि त्रिदेव पृथ्वी पर जाएंगे और देवी अनसुइया के आश्रम के सामने भिक्षा मांगेंगे , वो उस समय वहां जाएंगे जब अत्रि मुनि आश्रम में न हों और देवी अनसुइया से निवस्त्र रूप में भिक्षा देने के लिए कहेंगे। इसे निर्वाण कहा जाता है। योजनानुसार तीनों देवता वहां पहुंचे और देवी अनसुइया से नि:वस्त्र रूप में भिक्षा देने के लिए कहा। देवी अनसुइया भिक्षा देने से मना भी नहीं कर सकती थीं और पतिव्रता होने की वजह से निः वस्त्र भी नहीं हो सकती थीं। अजीब मुश्किल थी उनके सामने , फिर उन्होंने कुछ देर सोचा और अंदर से अपने पति अत्रि ऋषि के पैर धोने का जल (चरणामृत ) लेकर बाहर आईं और उसमें से कुछ बूँदें अंजुली ( हाथ ) में लेकर उन तीनों भिक्षुओं के ऊपर छिड़क दिया। देखते ही देखते वो तीनों भिक्षु , बालक रूप में परिवर्तित हो गए और इसी बीच देवी अनसुइया के स्तनों में दूध उतर आया । देवी अनसुइया ने तीनों बच्चों को दूध पिलाया जिससे उन्हें निःवस्त्र रूप में भिक्षा भी मिल गई और देवी अनसुइया का सतीत्व भी बना रहा। कुछ देर बाद महर्षि अत्रि स्नान से वापस आये तो देवी अनसुइया ने उन्हें पूरी बात बताई । देवी अनसुइया की बातें सुनकर और तीनों बालकों को देखकर अत्रि मुनि मंद मंद मुस्कराने लगे। वो इस सबसे पहले से ही परिचित थे और वो जानते थे कि ये तीनों बच्चे वास्तव में कौन हैं !! महर्षि अत्रि ने अपने कमंडल में से जल की कुछ बूँदें लीं और उन तीनों बालकों पर छिड़क दीं , तीनों बच्चे एक में परिवर्तित हो गए और उस एक बच्चे को नाम मिला दत्तात्रेय ! भगवान दत्तात्रेय !!

माता अनसुइया के मंदिर के सामने ही मंदाकिनी नदी बहती है और जब यहाँ दिल्ली -नॉएडा में अप्रैल के महीने में यमुना भी सूखी -सूखी सी नजर आने लगती है , मंदाकिनी अपने पूरे यौवन पर थी। मैं इस किनारे था लेकिन दूसरा किनारा बहुत सुन्दर लग रहा था , जाने का मन था लेकिन न तो आसपास कोई पुल दिखा और कहीं दूर जाकर पुल ढूंढने का समय नहीं था। ये एक ऐसी जगह है जहां बैठे - बैठे आप घण्टों गुजार सकते हैं , लेकिन अपने साथ समय की समस्या थी तो चल दिए और चल कहाँ दिए ? गुप्त गोदावरी की गुफाएं देखने !! आप भी साथ ही चल रहे हो न ? तो आ जाओ चलते हैं और इस रास्ते में आपको मंदाकिनी नदी की भी कहानी सुनाता जाता हूँ : समय आराम से पास हो जाएगा। आखिर अभी लगभग 10 किलोमीटर दूर और जाना है और रोड से हटकर रास्ता भी बहुत बढ़िया नहीं हैं। सही रहेगा न ?

इधर एक बार बिल्कुल भी बारिश नहीं हुई और अकाल पड़ने लगा तो महर्षि अत्रि मुनि ने अपने सभी शिष्यों को उनके घर भेज दिया और खुद तपस्या में लीन हो गए। अब देवी अनसुइया क्या करतीं ? उनकी तो दुनिया ही महर्षि अत्रि थे और महर्षि साधना में लीन हो गए तो देवी अनसुइया अपने पति यानि महर्षि अत्रि की परिक्रमा करने लगीं। ये साधना और परिक्रमा सात वर्षों तक चलती रही। इस सबको त्रिदेव देख रहे थे। अंततः एक दिन महर्षि अत्रि ने अपनी आँखें खोली और माता अनसुइया से गंगाजल माँगा। क्योंकि माता अनसुइया भी परिक्रमा में लीन थीं तो आश्रम में पानी नहीं था , इसलिए वो अपना बर्तन उठाकर बाहर दूर कहीं से पानी लाने के लिए निकल पड़ीं। भगवान शिव ये सब देख रहे थे तो वो माँ गंगा के साथ देवी अनसुइया से रास्ते में मिले और उनकी इतनी भक्ति से प्रभावित होकर वरदान मांगने के लिए कहा। देवी अनसुइया को क्या चाहिए था बस पानी , तो उन्होंने बर्तन भर पानी मांग लिया वरदान में। उनकी इस सह्रदयता को देखकर माँ गंगा ने देवी अनसुइया से कहा - देवी आपने जो महर्षि की परिक्रमा करते हुए ॐ नाम लेकर जो इतने पुण्य कमाए हैं उनमें से अगर आप मुझे एक वर्ष का पुण्य दे दें तो मुझे जिन लोगों ने दूषित किया है , मेरे सब पाप धुल जाएंगे। माता अनसुइया ने अपने सब पुण्य माँ गंगा को दे दिए और ऐसा पाकर माँ गंगा ने निश्चय किया कि वो मन्दाकिनी के रूप में यहां प्रवाहित होंगी। तो इस तरह मन्दाकिनी का उद्गम हुआ चित्रकूट में।

जितनी देर में आपने ये कहानी सुनी , हम आ पहुंचे हैं गुप्त गोदावरी की गुफाएं देखने। दो गुफाएं हैं यहां , एक बड़ी एक छोटी। जो पहली है वो बड़ी है और शायद वो ही मुख्य भी है। ऐसा माना जाता है कि गोदावरी नदी यहां से एक धारा के रूप में निकलती है और थोड़ी सी देर बहने के बाद यहीं दूसरी गुफा में गुप्त हो जाती है और फिर त्रियंबकेश्वर नासिक में निकलती है। शायद इसीलिए इसे गुप्त गोदावरी कहते हैं। पहली गुफा का रास्ता बहुत पतला सा है और सिर्फ एक ही व्यक्ति टेढ़ा -मेढ़ा होकर जैसे तैसे अंदर गुफा में जा पाता है और जब आप अंदर पहुँचते हैं तो एक खुला मैदान सा मिलता है। गुफा में प्रकाश की खूब बढ़िया व्यवस्था है हालाँकि फोटो साफ़ नहीं आते। यहीं सीता कुंड भी है और थोड़ा आगे जाकर खटखटा चोर भी लटका हुआ है। खटखटा चोर , नाम तो सुना होगा आपने ? ये वो राक्षस था जो सीता जी के कपडे चुरा ले गया था जब सीता जी स्नान कर रही थीं। लक्ष्मण जी को गुस्सा आया और उन्होंने उसे लटका दिया। वो यहीं लटका पड़ा है मूर्ति के रूप में।

दूसरी गुफा में चलते हैं जो बिल्कुल पास में ही है ! इसका लुक कुछ अलग है पहली वाली से। पहली वाली में शुरुआत में रास्ता एकदम संकरा है और गुफा एकदम खुली -फैली हुई है जबकि दूसरी गुफा का प्रवेश खूब चौड़ा है और लास्ट में जाते -जाते एकदम सिकुड़ता जाता है और अंतिम छोर पर पहुंचकर कुछ मूर्तियां रखी हैं , जहां दो तिलकधारी बैठे होते हैं , वो आपको तिलक तभी लगाएंगे जब आप दक्षिणा चढ़ाएंगे , तो स्वाभाविक बात है कि मुझे तिलक नहीं लगाया गया। यहां लगभग 10 मीटर तक अकेला ही आदमी निकल सकता है और प्रवेश द्वार से लेकर यहां अंतिम पग तक पानी भरा है। बीच में एक जगह तो घुटनों तक पानी था जिसमें से मैं धीरे -धीरे निकलने लगा लेकिन पैरों के नीचे कोई नुकीला पत्थर आ गया और पाँव बुरी तरह से जख़्मी हो गया। खून ही खून हो गया आसपास। वहां ISCKON के भी बहुत सारे लोग आये हुए थे , उनमें से ही किसी ने बाहर आकर पैरों में दवाई -पट्टी करी। अब और हिम्मत नहीं है , थोड़ा आराम कर लेता हूँ फिर आगे चलेंगे :
 































आगे अभी चित्रकूट धाम की यात्रा जारी रहेगी :

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

Chasing the footprints of Bhagwan Rama : Chitrakoot (Part-1)

 जानकी कुण्ड & स्फ़टिक शिला 

मौसम की Extreme Conditions में घूमने का स्वाद शायद कुछ और बढ़ जाता है मेरे लिए , या ये कहूं कि कुछ और ज्यादा मौका मिल जाता है घूमने का ! जून की सर्दी में मद्महेश्वर - नंदीकुंड का बेहतरीन ट्रैक किया था और उससे पहले अप्रैल की जबरदस्त गर्मी में लखनऊ और भगवान श्रीराम की पावन धरती चित्रकूट के दर्शन किये। जून में ठण्ड !! जी , नंदीकुंड में जून में भी उतनी ठण्ड तो रही ही होगी जितनी दिल्ली में जनवरी में पड़ती है या शायद उससे भी दो -चार डिग्री और कम , इसीलिए लिखा जून की ठण्ड !! और अप्रैल ? 15 अप्रैल 2017 का दिन था वो जब सुबह आठ बजकर 10 मिनट हुआ था और एक लड़का चित्रकूट - कर्वी रेलवे स्टेशन के सामने चाय -नाश्ता खत्म करके आगे कहीं जाने का इंतज़ार कर रहा था , पसीने की बूंदें माथे पर से लुढ़कती हुई गालों तक आतीं और चुपचाप नीचे सरकती हुई गर्दन पर से होते हुए शरीर को भिगो देती !! अभी आधा घंटा पहले ही तो नहाकर निकला था वो होटल से और Deo भी मारा था 😀 लेकिन आज जैसे चित्रकूट की पावन धरती उसके stamina का "Endurance Test " लेना चाहती थी। लड़का जाना -पहिचाना सा चेहरा था , आप जानते हैं उसे भलीभांति 😀। मोबाइल फ़ोन अभी 42 डिग्री तापमान बता रहा था और अभी तो दिन ढंग से निकला भी नहीं था , मुंह हाथ धोकर बाहर निकले सूरज ने अपना काम चालू कर दिया था , अभी ये हाल है तो दोपहर में क्या होगा 😫 ?? लेकिन 

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥
भगवान श्री राम और तुलसीदास जी की पुण्य धरा पर तुलसीदास जी का ही ये दोहा कितना सटीक लग रहा था उस दिन और उस समय। 


अभी जानकी कुण्ड के लिए ऑटो मिल गई है और जब तक वहां पहुंचूंगा आपको यहां आने तक की कहानी सुनाता चलता हूँ। 13 अप्रैल की रात को निकला हूँ गाज़ियाबाद से लखनऊ के लिए , लखनऊ मेल से लेकिन लखनऊ पहुँचते ही होटल लिया और हल्का -फुल्का नाश्ता करके सो गया। सोया तो ऐसा सोया जैसे आज के अलावा और कभी सोना ही नहीं है :) . दोपहर डेढ़ बजे आँख खुली तो फ़ोन चेक किया , हमारे ब्लॉगर मित्र मुकेश पांडेय जी का मैसेज था उनकी ट्रेन के लखनऊ पहुँचने के टाइम से समबन्धित। असल में ये हमारी और मान्यवर पांडेय जी की पहली मुलाकात होने वाली थी , आप लोगों में से अधिकांश मुकेश पांडेय जी को जानते होंगे , बेहतरीन ब्लॉगर हैं और ओरछा में रहते हैं। मध्य प्रदेश सरकार में आबकारी निरीक्षक हैं। तो जी उनसे मिलने के लिए स्टेशन भागा। वो अपने पूरे परिवार के साथ बिहार से वैष्णो देवी दर्शन करने गए थे और अब वापस लौट रहे थे। स्टेशन पर ही उनकी माता जी -पिताजी और भाइयों से मुलाकात हुई। पांडेय जी और उनकी धर्मपत्नी लखनऊ ही उतर गए - उन्हें झाँसी जाना था वापस अपनी नौकरी पर , तो खूब समय मिल गया बतियाने के लिए। हालाँकि तब से अब तक हम दोनों ही एक बड़े हादसे से ग्रसित हो चुके हैं। पांडेय जी के भी और मेरे भी पिता इस दुनिया से विदा हो गए 😥 !! मैं जब पांडेय जी के पिता जी से मिला था , वो एकदम हष्ट -पुष्ट और स्वस्थ थे लेकिन एक हादसे की वजह से जीवन का अंत हो गया ! दुखद खबर थी ये मेरे लिए भी ! अभी वो शायद 60 वर्ष के भी नहीं थे , हाँ मेरे पिता श्री 77 वर्ष के थे और प्राकृतिक मौत से वो दुनियां से विदा हो गए।

उधर लखनऊ से पांडेय जी परिवार को विदा किया और उधर मैं निकल चला चित्रकूट के लिए। मुझे लखनऊ में 16 अप्रैल को होना जरुरी था लेकिन अभी मेरे पास 15 अप्रैल का एक पूरा दिन बचा था तो उसका utilize चित्रकूट में करते हैं !! निकल चले बिना रिजर्वेशन के , लेकिन रिजर्वेशन वाले ही कोच में। TTE आएगा तो पेनल्टी भर देंगे लेकिन न TTE आया न टिकट चेक हुआ । सामान होटल में ही छोड़कर और कुछ जरुरी चीजें लेकर चित्रकूट की पावन धरती पर पहली बार जाने का उत्साह मन में हिलोरें मार रहा था। सुबह दो या ढाई बजे चित्रकूट -कर्वी स्टेशन उतरा तो नींद बहुत तेज आ रही थी और गर्मी भी बहुत थी।

एक होटल में कमरा पूछा कितने का है ?

500 रुपया !!

मैं चल दिया !!

कितना दोगे ?

मैंने कहा- 100 रूपये ! मुझे बस 4 घण्टे सोना है और सुबह नहाना है !!

ठीक है तो 400 दे देना !!

नहीं भाई ! 100 से ज्यादा नहीं !! मैं कहीं और देख लेता हूं !!

साढ़े तीन सौ से कम नहीं मिल पायेगा !!

ठीक है !! डेढ़ सौ दे दूंगा , और ज्यादा नहीं

ठीक है , लेकिन 20 रूपये मुझे अलग से दे देना सुबह बढ़िया चाय पिलाऊंगा !!

हो गया काम !! सुबह चाय भी पिला देना और जगा भी देना , सात बजे !! ठीक है !! ठीक है सर

लो जी आ गए जानकी कुण्ड ! जानकी कुण्ड , वो जगह है जहां ये माना जाता है कि भगवान श्री राम के वनवास के समय माता सीता यहां स्नान करती थीं। मंदाकिनी नदी के किनारे कुछ पैरों के निशान दिखाई देते हैं और ऐसा माना जाता है कि माता सीता के पैरों के निशान हैं।

चित्रकूट का मतलब है " Hill of Many Wonders " और मजेदार बात ये है कि यह एक ऐसी जगह है जो उत्तर प्रदेश में भी आती है और मध्य प्रदेश में भी। उत्तर प्रदेश का जो जिला मुख्यालय कर्वी में है और मध्य प्रदेश का जो हिस्सा है वो सतना जिले में आता है। ये तो इसका भौगौलिक मामला हुआ और अब आ जाते हैं इसके धार्मिक महत्व पर। भगवान श्री राम ने अपने 14 वर्षों के वनवास में कुछ समय यहां सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ गुजारा था। यही वो पावन भूमि है जहां अत्रि मुनि , सती अनुसुइया , दत्तात्रेय , महर्षि मार्कण्डेश्वर , महर्षि वाल्मीकि ने तपस्या की। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान श्री राम ने अपने पिता दशरथ का श्राद्ध किया था तब सभी देवी -देवता चित्रकूट की पावन धरती पर उपस्थित हुए थे। महर्षि वाल्मीकि ने अपनी लिखी रामायण में चित्रकूट को महान संतों की भूमि बताते हुए इसे बंदरों -भालुओं से भरी सुन्दर भूमि कहा है। और यही पावन भूमि आज भी चित्रकूट धाम के नाम से जानी जाती है। महर्षि वाल्मीकि ने प्रथम बार चित्रकूट का वर्णन किया है जबकि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस और कवितावली तथा विनय पत्रिका में भी इसका वर्णन किया है। अब जब इतनी पवित्र और ऐतिहासिक धरती पर हैं तो ये जान लेना भी जरुरी हो जाता है कि यहां घूमने लायक क्या क्या है ? कहाँ कहाँ जा सकते हैं ? देखते हैं :
  • जानकी कुण्ड
  • स्फ़टिक शिला
  • सती अनुसुइया आश्रम
  • राम घाट
  • स्फ़टिक शिला
  • गुप्त गोदावरी की गुफाएं
  • हनुमान धारा
  • भरत कूप
  • भरत मिलाप
  • कामदगिरी
  • मरफा
जानकी कुण्ड से कुछ किलोमीटर आगे ही स्फटिक शिला है। ये जगह रोड से कुछ हटकर है , शायद दो किलोमीटर दूर होगी रोड से तो शेयर्ड टैम्पो / ऑटो नहीं मिल पाते ! हाँ कभी कभार कोई लिफ्ट दे दे तो अलग बात है नहीं तो पांवों को कष्ट देना ही पड़ेगा। रास्ते के दोनों तरफ बहुत से वृक्ष हैं तो गर्मी का एहसास नहीं होता पैदल चलते हुए भी। अपने साथ में पानी की बोतल लेना बिल्कुल मत भूलिए। स्फटिक शिला एक पत्थर है जिस पर भगवान राम के पैर का निशान बना है ।

स्फ़टिक शिला के आसपास कुछ मंदिर भी हैं , बहुत सुन्दर तो नहीं हैं लेकिन पुराने हैं तो देखने का मन करता ही है। अच्छी बात लगी कि आसपास ही गाय और बंदरों को खिलाने के लिए उनका भी प्रसाद बिक रहा था , और बेचने वाले भी प्रसन्न लग रहे थे। यहां मुझे अपने यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का एक Statement याद आता है कि Tourism एक ऐसी Industry है जो गरीब से लेकर अमीर तक और चाय वाले से लेकर फाइव स्टार होटल वाले तक को कमाने का अवसर प्रदान करती है। 

स्फ़टिक शिला मंदाकिनी नदी के किनारे पर ही है और वहां एक पंडित जी राम जी के पैर को लोगों को दिखा भी रहे थे , कुछ ज्ञान भी दे रहे थे और बदले में दक्षिणा भी ग्रहण कर रहे थे। 40 से 50 लोग , शायद सब बंगाली थे , अगर एक ने 10 रूपये भी दिए तो बन गए 500 रूपये। बढ़िया है !! ये तो चलो ठीक है लेकिन नदी में सिक्के भी फेंक रहे थे कुछ लोग , उसका मतलब समझ नहीं आया। मुझे न पंडित जी को दक्षिणा देनी थी और न ज्ञान प्राप्त करना था तो चले आये और जैसे ही चले एक टैम्पो पीछे से आता हुआ दखाई दिया और लटक गए रोड तक , केवल पांच रूपये में !! गर्मी है तो कोल्ड ड्रिंक तो बनती है और जब कोल्ड ड्रिंक की बात चली तो मरफा की भी बात चलने लगी जो यहाँ से दूर था और अपने ही Vehicle या फिर किराए के व्हीकल से ही जाना संभव था , शेयर्ड टैम्पो /ऑटो नहीं जाते। मरफा में कोई फॉल है ! कोल्ड ड्रिंक बेच रहे लड़के को तैयार किया कि वो 300 रूपये में अपनी बाईक से लेकर जाएगा और यहीं छोड़ देगा , लेकिन जैसे ही उसने अपनी माँ को बताया , उसने मना कर दिया और मरफा जाना कैंसिल हो गया। अब आगे सती अनुसुइया आश्रम चलेंगे......


लखनऊ​ रेलवे स्टेशन के बाहर

पहुँच गए चित्रकूट धाम

जानकी कुण्ड , चित्रकूट
जानकी कुण्ड , चित्रकूट
जानकी कुण्ड , चित्रकूट
जानकी कुण्ड , चित्रकूट




स्फ़टिक शिला के सामने का मंदिर
ये भगवान राम का पैर माना जाता है


स्वाद (Taste ) बदल गया:)











आगे चलेंगे अभी: