शनिवार, 27 अगस्त 2016

Old Indian currency system

एक आईडिया अगर जिंदगी बदल सकता है तो एक विषय , एक टॉपिक दिमाग को घुन लगाने के लिए काफी है ! व्हाट्स एप्प पर नीरज अवस्थी जी की एक छोटी सी पोस्ट आई इस विषय से सम्बंधित,  और मन में ये बात बैठ गयी कि टॉपिक न केवल मनोरंजक रहेगा बल्कि जानकारी से भरा भी होगा ! उस दिन से जितना भी समय मिलता गूगल चाचा के कान में ऊँगली कर देता , चचा बताओ ! चचा बताते तो फिर चुल्ल उठती , चचा थोड़ा और बताओ ! कॉलेज में मुफ्त के ब्रॉडबैंड और मुफ्त का Wi-Fi , लेकिन समय की कमी ! आखिर गूगल चाचा के कान में ऊँगली करते करते पाकिस्तान के ब्लॉगर के ब्लॉग तक भी पहुँच गया ! उर्दू की थोड़ी समझ है , जितनी अंग्रेजी की है , उससे कुछ ज्यादा कह सकते हो ! अगर अंग्रेजी में 10 में से तीन नम्बर आएंगे तो उर्दू में साढ़े तीन ! 





विषय भी क्या था - आपने अच्छी तरह सुना होगा और कहा भी होगा ! पहले सोचिये , याद करिये , कभी आपने ये शब्द किसी को कहे हैं या किसी ने आपसे कहे हैं ?  वैसे ऐसे शब्द प्राइवेट नौकरी में बॉस अपने अधीन कर्मचारी से , दूकान मालिक अपने नौकर से और घर में माँ बाप अपने बेटे से खूब कहते हुए मिलेंगे ! ये मुहावरे देखते हैं :


"चमड़ी जाये पर दमड़ी ना जाए"               “Chamri jae par Damri na jae”

" कौड़ी के मोल बिकना "                           “Cowrion ke mol bikna”

"इसके पास तो एक फूटी कौड़ी भी नही है "     “Is ke paas to ek Phooti Cowri bhi nahi hai”

"ये लड़का तो एक धेले का भी काम नही करता "
“yeh ladka to ek Dhelay ka bhi kaam nahi karta hai ”



सुनी हैं न ये सब कहावतें ? सुनी होंगी यार सबने , कौन सा आप इंग्लैंड से आये हो ? हाहाहा ! और मुझे पूरा भरोसा है कि आपने ये वाली कहावतें भी जरूर सुनी होंगी !


" इसे तो मैं एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा अपनी जायदाद में से "
" ise to main ek 'phooti cowrie' bhi nahin doonga apni jaaydaad mein se ..

" हमारी बहु तो पूरा दिन बस टीवी देखती रहती है , धेले भर का काम नही करती "  
" Hamari bahu to poora din bas TV dekhti rahti hai , dhelay bhar ka kaam nahi karti "

"पाई पाई का हिसाब दे दूंगा " 
" Pie Pie ka Hisab de dunga "
कभी ये सोच में आया कि ये शब्द आये कहाँ से ? वैसे जहां सोच वहां ......... ? जो सोचना है सोच लो ! तो ये शब्द असल में हमारी पुराने जमाने की मुद्रा (Currency ) से आये हैं ! मतलब आज के जमाने की तरह पुराने समय में पैसा , रुपया नही बल्कि कौड़ी , फूटी कौड़ी , दमड़ी , धेला , पाई ये सब चलते थे !


तो आज का विषय यही है भाई , भारत देश की पुरानी मुद्रा ! आज आप जो रुपया देखते हो , पैसा देखते हो वो बहुत देर में , बहुत मॉडिफिकेशन के बाद आया है ! विश्व में सबसे पहले सिक्का (Coin ) भारत के प्राचीन मौर्या शासन काल में लगभग 6 वीं सदी में शुरू हुआ था और वहीँ से रुपया आया ! रुपया ,संस्कृत शब्द "रूप" से आया है ! मौर्य वंश में जो सिक्के प्रचलित थे उन पर किसी न किसी जानवर या भगवान की आकृति छपी रहती थी।, आकृति मतलब उसका रूप और वो ही रूप आगे चलकर रुपया हो गया ! इसी सिक्का मुद्रा को आगे मुग़ल लोगों ने भी जारी रखा लेकिन पहले जो आकृति इन पर अंकित की जाती थी उसकी जगह उर्दू -फ़ारसी में उस शासक का नाम लिखा जाने लगा ! फिर 1540 ईसवी के आसपास शेर शाह सूरी ने अपने सिक्के जारी किये ! हालाँकि इस बीच बहुत से शासकों ने अपने अपने सिक्के चलवाये जो चमड़े से लेकर सोने तक के बने हुए थे लेकिन वो ज्यादा प्रचलित नही हो सके !

ये जो फूटी कौड़ी होती थी वो ऐसा नही है कि बाबा आदम के जमाने में चलती होगी , ये मुद्रा यानि कौड़ी बंगाल -ओडिशा में 19 वीं शताब्दी तक प्रचलन में रही है ! हालांकि तब बाकी जगह कॉपर के सिक्के चलते थे लेकिन कौड़ी की प्रसिद्धि इतनी थी कि कोई ताँबे के सिक्के लेता ही नही था और अगर आप उस वक्त , मतलब  लगभग 1821 ईसवी में कौड़ी की  कीमत देखें तो एक रूपये में 2560 कौड़ी आती थीं !

Old Indian currency system


Phootie Cowrie to Cowrie           फूटी कौड़ी से कौड़ी
Cowrie to Damri                          कौड़ी से दमड़ी
Damri to Dhela                           दमड़ी से धेला
Dhela to Pie                                धेला से पाई
Pie to to Paisa                            पाई से पैसा
Paisa to Rupya                           पैसे से रुपया
256 Damri (दमड़ी ) = 192 Pie (पाई ) = 128 Dhela (धेला ) = 64 Paisa (old) (पुराने पैसे ) = 16 Anna (आना )  = 1 Rupya (रुपया ) 


 तो मिलते हैं फिर जल्दी ही  , तब तक आप चाहो तो ये फोटू भी देखते जाओ:






फूटी कौड़ी
Phootie Cowrie

कौड़ी cowrie


धेला dhelaa

पाई pie

आना aanaa






खुश रहिये , मजे करिये ! राम राम












बुधवार, 24 अगस्त 2016

Satopanth Yatra : Satopanth Taal

अगर आपको ये यात्रा वृतांत शुरू से पढ़ने का मन हो तो आप यहां क्लिक करिये, पहले ही पोस्ट से पढ़ पाएंगे !

सतोपंथ ! जब से इसके विषय में पढ़ा , जाना , समझा तब से सपनों में बसा था , आज इस पवित्र ताल पर पहुंचकर मन को जो प्रसन्नता मिली , उसे केवल महसूस किया जा सकता था , लिखना शायद मुश्किल होगा ! दोपहर बाद के साढ़े तीन का समय हो रहा है ! एकदम से भीड़ सी दिख रही है यहां , कई सारे तम्बू लगे पड़े हैं ! हरियाली भी दिखी , एक नहीं दो -तीन ! उनके साथ बहुत सारे पोर्टर हैं जो मशीन लाद लाद कर लाये हैं ! हरियाली से बस इतना ही पूछ पाया - फ्रॉम वेयर यू आर ? न्यूज़ीलैण्ड ! इतने में उसका नाश्ता आ गया तो मैं चल दिया कि कहीं हरियाली ये न समझ ले कि मैं उससे चिपकने की कोशिश कर रहा हूँ ! खैर वो मशीन ग्लेशियरों का अध्ययन करने की मशीन थीं और वो हरियाली भूगर्भ वैज्ञानिक ! जल्दी ही तामझाम समेट लिया उन लोगों ने और आगे की तरफ बढ़ गए , आगे मतलब स्वर्गारोहिणी की तरफ ! आज की रात भी सूखी गुजरेगी ! कोई नही ! ओह , और लोगों ने भी अपना टंडीला इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है , इसका मतलब आज सतोपंथ पर हम ही रहेंगे , हाँ अमन बाबा तो हमेशा ही यहां रहते हैं !

अमन बाबा की भी बात कर लें कुछ ? आपने 2016 से पहले के जितने भी सतोपंथ के ब्लॉग या आर्टिकल पढ़े होंगे उनमें आपने पढ़ा होगा कि वहां एक "मौनी " बाबा भी रहते हैं जो किसी से बात नही करते लेकिन अब उन मौनी बाबा की जगह पर एक नौजवान बाबा "अमन बाबा " सतोपंथ पर रहते हैं , और उसी "महल " में रहते हैं जहां मौनी बाबा रहते थे ! हमारे सतोपंथ पहुँचने से पहले अमित तिवारी जी अमन बाबा से मुलाक़ात कर आये थे और शायद वो सन्देश भी अमन बाबा को दे दिया था जो अमन बाबा की माँ ने भिजवाया था ! सन्देश ये था कि अमन बाबा की कहीं सरकारी नौकरी लग गयी है ! हम भी अमन बाबा के "महल " में होकर आये ! महल इसलिए कहा कि ऐसी दुर्गम जगह पर उन्होंने रहने का जो स्थान बना रखा है अत्यंत साफ़ सुथरा और व्यवस्थित है ! बाहर वाला "कमरा " आने जाने वाले दर्शनार्थीयों के लिए है जबकि अंदर वाला ' कमरा " बैडरूम का काम करता होगा ! एकदम साफ़ सुथरा और सजा हुआ बैडरूम !


अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं , अमन बाबा के चक्कर में कहाँ पहुँच गए ? तो जी , हमारे पहुँचने से पहले सभी पॉर्टर और ज्यादातर साथ वाले लोग सतोपंथ पहुँच गए थे और जो झंडी तक पहुँचता वो जोर से चिल्लाता जैसे कोई अजूबा देख लिया हो ? हाँ , अजूबा ही तो था जो सामने त्रिकोण दिख रहा था सतोपंथ ताल के रूप में ! जब तक हम पहुंचे , गज्जू भाई एंड पार्टी ने मस्त गर्मागर्म सूप बनाकर तैयार कर दिया ! दो गिलास खेंच दिए ! मजा आ गया ! अब तम्बू गाढ़ लेते हैं , गढ़ गया तंबू भी ! बम्बू नही है हमारे पास इसलिए वो गाना " हम तो तंबू में बम्बू लगाय बैठे .. ....... गाने का कोई फायदा नही ! नहाने चलते हैं , तीन दिन से नहाया नही और इस पवित्र ताल में स्नान करना स्वयं में फलदायक रहेगा ! तो हो जा बेटा योगी तैयार , ठण्डे बर्फीले से पानी में डुबकी लगाने को ! लो जी , तैयार और मार ली 5 -7 डुबकी ! सारे पाप धुल गए लेकिन सच कहूँ तो ज्यादा पाप नही किये अभी तक !


कुछ खा पीकर इस पवित्र ताल की परिक्रमा को चलते हैं ! पहले कौन गया , कौन गया ? याद नही आ रहा ! शायद अमित भाई निकले थे , फिर विचित्र आत्मा विकास नारायण श्रीवास्तव फिर बीनू भाई , जाट देवता संदीप भाई , सुमित नौडियाल , सुशील जी और फिर मैं ! किनारे किनारे चलते हुए दूसरे कोने पर जा पहुंचे जहां से टूटे हुए ग्लेशियर बिल्कुल साफ़ दिख रहे थे , हालाँकि रास्ते में ग्लेशियर टूटने की आवाज़ें खूब आती रही लेकिन पिछले 2 -3 घंटे से सब शांत है , कहीं तूफ़ान से पहले की सघन शांति तो नही ? परिक्रमा ख़त्म होने से पहले हल्की हल्की बारिश होने लगी थी तो एक जगह पत्थर की ओट लेकर छुप गए ! लेकिन जैसे ही थोड़ा ऊपर की तरफ पहुंचे तो बारिश फिर से आ गयी और इस बार तेज थी ! बड़े बड़े पत्थर , कोई रास्ता नही , एक गुफा में जैसे तैसे सरक सरक के घुस गए ! आधा घण्टा वहीँ बीत गया ! ये भी अच्छी जगह है रात बिताने को ! वापस धीरे धीरे करके उस जगह पहुंचे जहां आज गज्जू भाई ने अपना कब्जा जमा रखा है ! ये कभी कोई आश्रम रहा होगा , लेकिन आज इसमें हमारा किचन बना हुआ है और जाट देवता तथा सुमित भाई ने भी अपना डेरा यहीं डाल लिया है आज की रात !


मैं भी कुछ देर इसी फाइव स्टार होटल में पड़ जाता हूँ ! मैं वहां घंटे भर के आसपास रुका होऊंगा लेकिन इस घण्टे भर में दो बार गिलास भर भर के चाय खेंच गया ! मौजा ही मौजा ! अपने घर , यानि अपने तम्बू में लौट चलते हैं ! रात के 10 बजे हैं , बीनू भाई की तबियत खराब सी हो रही है , बाकी न जाने क्या बेच के सो रहे हैं ! पता नही आज कोई लाद खेलेगा कि नही ! सुबह कुछ लोगों को स्वर्गारोहिणी की यात्रा करने जाना है , जहां वो चंद्रताल , सूर्यकुंड और विष्णुकुंड तक जाने का प्लान बनाये हुए हैं ! कल की कल देखेंगे, अभी तो सोने चलते हैं इस बियाबान में , जहां आज हम लोगों के अलावा और कोई नही , हैं तो सिर्फ सोये हुए पहाड़ , शांत -चिरशांत सा प्रतीत होता सतोपंथ और सामने करीब 3 किलोमीटर दूर स्वर्ग के द्वार तक पहुंचाने वाली सीढियां यानि स्वर्गारोहिणी ! 

तो कल मिलते हैं फिर से : 






सतोपंथ पर एक छोटा सा मंदिर भी है







पूरी टीम ! न न इसमें मैं और विकास नही हैं

विकास इसमें भी नही है ! बाएं से संजीव त्यागी , सुमित नौटियाल , कमल कुमार सिंह , मैं (योगी ), अमित तिवारी , जाट देवता , सुशील कैलाशी , बीनू कुकरेती आगे लाल लाल

पवित्र सतोपंथ का पवित्र जल












पीली चौंच का कौवा







हमारा सतोपंथ का फाइव स्टार होटल

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

Satopanth yatra : Third Day (Chakrateerth to Satopanth)

सतोपंथ यात्रा : तीसरा दिन ( चक्रतीर्थ से सतोपंथ)




अगर आपको ये यात्रा वृतांत शुरू से पढ़ने का मन हो तो आप यहां क्लिक करिये, पहले ही पोस्ट से पढ़ पाएंगे !


चक्रतीर्थ दोपहर के तीन बजे के आसपास पहुंच गये थे हम दोनों । ​हम दोनों का मतलब मैं और कमल भाई , जो सबसे पीछे चल रहे थे , सबसे पीछे ही पहुंचे ! इतने पीछे की कि टैन्ट भी लगाये जा चुके थे और वहां पहले से पहुंचे हुए लोग जैम लगा लगा कर बन का लंच कर रहे थे ! हमें भी जाते ही चाय और जैम लगा बन खाने को मिल गया ! पहले से ही हलकी हलकी बूंदाबांदी हो रही थी जो अब और भी बढ़ गयी ! हमारा और अमित भाई का टैन्ट नीचे की तरफ लगा था जबकि बीनू भाई का टैन्ट , गुफा से थोड़ा पहले ऊपर की ओर था ! चक्रतीर्थ पर जहां हम रुके थे , वहां दो गुफाएं हैं ! एक में खाना बन रहा था तो दूसरी में जाट देवता संदीप भाई ने अपना ठिकाना बना लिया ! मैं अब अपनी चाय लेकर नीचे नही जाना चाह रहा ​था , एक तो थका हुआ था और फिर हलकी हलकी बारिश भी हो रही थी ! मैं अपना बन और चाय लेकर संदीप भाई वाली गुफा में ही घुस गया ! हालांकि जगह कम पड़ रही थी , क्योंकि वहां पहले से ही संदीप भाई के अलावा अमित तिवारी जी भी अंदर की तरफ घुसे हुए थे !




खैर थोड़ी देर बाद जब बारिश रुकी तो मैं गुफा से बाहर निकला और बीनू बाबा के टैन्ट में जा घुसा , वहां पहले से ही तीन मुस्टण्डे बीनू भाई , कमल और सुमित बैठे थे , मेरे जाने से और भीड़ हो गयी ! पत्ते निकालो यार , लाद खेलते हैं ! मैं इस बीच नीचे जाकर अपना अखरोट का पैकेट उठा लाया , अब महफ़िल मस्त जमेगी ! इस बीच खाने से पहले गर्मागर्म सूप भी मिल गया है ! आप इस पल को थोड़ा मेरे साथ जी कर देखिये ! पहाड़ों के बीच खुले मैदान में टैण्ट लगा है , बाहर हलकी हलकी बारिश हो रही है , अंदर चार लोग बैठे पत्ते खेल रहे हैं और हाथ में गरम सूप और चबाने को अखरोट ! आय हाय , क्या मस्त माहौल होगा ! मजा आया न आपको भी ? आपको और हमें तो मजा आया लेकिन नीचे के टैन्ट में बवाल हो गया गुरु !


हुआ यूँ कि बारिश रुकने पर अमित भाई , संदीप भाई की गुफा से निकालकर नीचे अपने टैन्ट में चले गए और वहां पहले से ही आराम फरमा रहे संजीव त्यागी जी के पास लेट गए ! बगल में हमारे वाले टैन्ट में विकास नारायण श्रीवास्तव जोर जोर से मोबाइल पर गाना सुनने में मस्त हैं ! सुशील जी , संदीप भाई के साथ गुफा में हैं ! संजीव जी ने विकास को बोला - भाई आवाज कम कर ले मोबाइल की या फिर हेड फोन लगा के सुन ले, मेरे सर में दर्द हो रहा है और मुझे आराम करना है ! लेकिन आवाज़ इतनी तेज थी कि न विकास को आवाज सुनाई देनी थी न ही दी और इसका परिणाम ये हुआ कि संजीव जी अपने दड़बे से निकले और विकास को उल्टा सीधा जो कहना था कह डाला ! बवाल नीचे से शुरू होकर ऊपर तक आ गया और विकास बाबू गुस्सा हो गए ! गुस्सा चरम पर पहुंचा तो विकास बाबू नाराज होकर बिना कुछ लिए वहां से निकल लिए वापसी के लिए ! शाम के छह या साढ़े छह बजे होंगे उस समय ! पहले तो सबने सोचा कि ये वापस आ जायेगा और जब उसने एक पहाड़ी पर चढ़कर वापस उतराई पकड़ी तो दिमाग में बत्ती जलने लगी सबके !! ठण्ड इतनी है और इसके पास कुछ है भी नहीं ! खिले हुए चेहरे उतरने लगे ! दर्द जब हद से गुजरता है तो दवा बन जाता है ! सबने ये सोचकर चिंता छोड़ दी कि आ ही जाएगा , जाएगा कहाँ ? फिर से लाद खेलनी शुरू कर दी और अब चार से बढ़कर पांच हो गए खेलने वाले , संजीव जी भी आ गए थे ! बारिश अभी भी लेकिन बहुत हलकी हलकी ! खिचड़ी खा के सो जाते हैं , रात के 10 बजने को हैं ! सो भी लेना चाहिए , सुबह फिर चलना है और ऐसे रास्ते पर चलना है जो अब तक का सबसे कठिन , दुर्गम और भयानक रास्ता है ! है तो केवल 6 -7 किलोमीटर ही लेकिन बहुत कठिन और जोखिम भरा है ! गुड़ नाईट !


राम राम मित्रो ! आज 15 जून है और सुबह बहुत शानदार ! रात की बारिश ने सब जगहों को गीला कर डाला है जिसके परिणामस्वरूप फ्रेश होकर आने के लिए कोई जगह नहीं दिख रही ! आखिर ऊपर की तरफ ही निकलना पड़ा ,पत्थरों को पार करते हुए ! चाय पीकर और थोड़ा सा बन लेकर आगे चलने की तैयारी शुरू कर दी ! मैं और सुशील जी अपना टैण्ट उठाने लगे तो उसमें आधा खाया हुआ बन मिला ! पता किया तो विकास बाबू का बन था वो ! हाँ , विकास बाबू का ही ! वो रात में न जाने कब लौट के आ गए थे और आकर हमारे टैन्ट में घुसकर सो गए ! लौटकर आये होंगे तो भूख लगी होगी और किसी पोर्टर से बन खाने को माँगा , जितना खाया खा लिया बाकी अपने पास रख लिया ! इस बात से अमित भाई को बड़ा गुस्सा आया जो सही भी था ! खाना बहुत सीमित होता है ऐसी जगह और आप उसे बर्बाद नहीं कर सकते ! आधा खाया हुआ बन , टैन्ट में देखकर मेरा भी दिमाग भन्ना गया और मैं बिना टैन्ट पैक किये निकल गया !


आज सबसे पहले निकलने वालों में कौन था , ये जानना रोचक होगा ! मैं और कमल भाई , दो फिसड्डी लोग ! आगे एक बहुत ऊँची दीवार जैसी पहाड़ी दिखाई दे रही है , वो पर करनी पड़ेगी ! उस पर एक झण्डी लगी है जो बहुत दूर से दिखाई दे रही थी कल भी ! उसे दिखा दिखा कर पोर्टर कह रहे थे बस इसे पर करते ही सतोपंथ आ गया समझो ! और इसी समझो समझो में अभी सतोपंथ कम से कम 6 -7 किलोमीटर और है ! ये एकदम से खड़ी चढ़ाई है , एक एक कदम के बाद आराम लेने के लिए रुकना पड़ रहा है ! आगे -पीछे वो लोग भी चले आ रहे हैं जो हमसे थोड़ा पीछे रुके थे रात को ! कुछ 50 वर्ष से ऊपर के भी हैं ! श्रधा -आस्था , हिम्मत सब जुटाकर यहां तक आ गए हैं तो आगे भी पहुँच ही जायेंगे ! हिम्मत और इनकी आस्था को प्रणाम करना तो बनता है ! हमसे पीछे आये बीनू भाई जाट देवता आगे निकला चुके हैं ! हम कछुआ हैं लेकिन फिर भी जीत नहीं पाये , यहां हमेशा जाट देवता , बीनू भाई और अमित भाई जैसे खरगोश ही जीते बार बार , हर बार ! कछुआ पीछे ही रहा , पिद्दी कहीं का ! खरगोश से जीतने निकला था ! मजाक था यार , यहां कोई किसी से जीतने या हारने नहीं निकला ! सब आपस में मिलकर एक पवित्र और दुर्गम जगह जाना चाहते हैं ! वो जो झण्डी दिख रही है वहां सबसे पहले जाट देवता पहुँच गए और वहीँ जाकर और लोगों का इंतज़ार करने लगे ! दुसरे नंबर पर बीनू भाई और तीसरे पर मैं फिर कमल भाई ! ये धार है ! धार का मतलब ऊपर बहुत कम जगह है बैठना भी मुश्किल है लेकिन लंबाई बहुत है ! दोनों तरफ ढलान है , इधर पहाड़ है ढलान पर तो उस तरफ बड़े बड़े पत्थर ! मैं यहां खड़े होकर इस एहसास को , इस पल को भरपूर जीना चाहता हूँ ! लेकिन हवा का दबाव खड़े तक नहीं होने दे रहा ढंग से ! बस झण्डी पकड़ के एक फोटो खिंचवाया और चलता बना ! मुझसे पहले जाट देवता और बीनू भाई उतर चुके थे और नीचे बैठे इंतज़ार कर रहे थे ! इंतज़ार इस बात का कि कौन कौन फिसलता है !


हुआ ये था कि इस ऊँची पहाड़ी के दूसरी तरफ , यानि सतोपंथ की तरफ बहुत ज्यादा ढलान है जिस पर पहले जाट देवता तो आराम से उतर गए लेकिन बीनू भाई फिसल गए , फिर हमसे पीछे आये गाइड कम पोर्टर गज्जू भाई भी बढ़िया तरह से फिसल गए ! ये दोनों जाट देवता और बीनू भाई , मुझे कहने लगे कि मैं जरूर गिरूंगा ! चुनौती स्वीकार बीनू भाई , नहीं गिरूंगा ! और भले मेरी कमर टेढ़ी हो गयी लेकिन खुद को फिसलने नहीं दिया ! हुर्रे , फिसलने से बच गया ! दो और गिरे इसके बाद और उन्हें देखकर जो आनंद आया उसे शब्दों में कह पाना मुश्किल है ! आगे चलते हैं !

आगे अब जहां तक नजर जाती है सब जगह बस पत्थर ही पत्थर नजर आ रहे हैं ! न कोई रास्ता , न कोई रास्ता जैसी चीज ! पता ही नहीं चलता कि किधर जाना है , कैसे जाना है ! लेकिन है एक चीज जो आपको बतायेगी कि कैसे , किधर को जाना है ! बताया था आपको , वो दो दो तीन तीन पत्थर रख देते हैं वहाँ के लोग ! जिससे रास्ते का थोड़ा अंदाज़ा लग जाता है ! हे भगवान, इतने बड़े बड़े पत्थर और इन्हें ही पर करते हुए रास्ता नापते जाना है ! ऊपर से कभी कभी ग्लेशियर टूटने की आवाज़ आती है तो दिल बैठ जाता है कि कहीं यहीं न जिंदगी थम जाए ! बहुत दुर्गम ! एक एक करके चले जा रहे हैं सब ! लड़की नहीं दिखाई दी कोई भी ! ये एक दोष है इस रास्ते का ! इस चढ़ाई से उतरकर एक बड़ा सा कच्चा पहाड़ है जिसे गोल गोल चलकर पर करना है ! ऊपर से लगातार मिटटी , छोटे छोटे पत्थर और बर्फ के टुकड़े टूट टूट कर नीचे आ रहे हैं जिनसे बचकर भी चलना है और देखकर भी कि कहीं हमारे ऊपर ही न आकर गिर जाएँ ! हम ज्यादातर लोग लगभग एक साथ चल रहे हैं , बस अमित भाई थोड़ा आगे हैं लेकिन विकास नारायण को पता नहीं क्या सूझी कि वो गोल गोल न आकर पहाड़ पर ऊपर की तरफ चला गया और फंस गया है ! ऊपर ग्लेशियर टूटता है तो लगता है क्या होगा इसका ? धीरे धीरे वो उतरकर आता है तब जान वापस आती है !


कुछ खाया भी नहीं सुबह , बस चाय और बन ! लेकिन बैग में बिस्कुट और एक बन रखा हुआ है , काम चल जाएगा ! कहीं से पानी बहने की आवाज़ आ रही है लेकिन दिख नहीं रहा ! ओह , ये यहां है ! बहुत गहरा गड्ढा है ये , मतलब क्रेवास ! ये क्रेवास बहुत भयानक और खतरनाक होते हैं ! बच के चलना होता है , अगर कैसे भी इसके अंदर चले गए तो भूल जाइये आपके कुछ थे , इतिहास बनाएंगे नहीं इतिहास बन जाएंगे ! कोई बचाने वाला नहीं ! इन ऊँची ऊँची चढ़ाई पर पत्थर ही टेक लगाकर खड़े होने का भी सहारा देते हैं और रास्ते को थोड़ा आसान भी कर देते हैं ! बस वो रहा सतोपंथ वाला झण्डा ! वो दिख रहा है !

इस आज की आखिरी चढ़ाई को चढ़ने में जोश वापस आ गया है ! ऊपर लगी झण्डी बार बार पुकार रही है और हौसला दे रही है , आ मेरे बच्चे आ जा ! तुझे अपनी गोद में भर लेने के लिए तेरा इंतज़ार कर रही हूँ ! मैं चढ़ाई चढ़ते हुए हांफ रहा हूँ मगर दूसरी तरफ से पता नहीं कहाँ से एक गोरी यानी अँगरेज़ लड़की आराम से बिना किसी स्टिक के छिपकली की तरह चढ़ती चली आ रही है ! सुकून मिल गया दिल को ! कुछ तो हरियाली देखने को मिली इतने दिनों का बाद ! मन ही मन सोचने लगा - चलो अब इनसे सतोपंथ पहुंचकर ही दोस्ती बनाएंगे ! हाहाहा ! हँसते रहिये , जिंदगी को मजे से जीते रहिये , मैं फिर मिलूंगा आपसे और आपको सतोपंथ पहुँचने के बाद की बात सुनाऊंगा !






ये दीवार चढ़ के आये हैं हम ! धार इसे ही कहते हैं जहां खड़ा होना मुश्किल हो गया




ये मेरा इस यात्रा का सबसे फैवरेट फोटो है ! यहां धार से उतरते हुए बीनू भाई ने चैलेंज किया कि मैं गिरूंगा जरूर , लेकिन मैं जीत गया !! हाहा








इस पहाड़ को गोल गोल चलकर पार किया

रास्ते की हालत देखिये

रास्ते की हालत देखिये















रास्ता है कहीं ? आगे जाने को


एक सुन्दर पहाड़ सूरज की किरनें पड़ने के बाद , नवजात शिशु की तरह मुंह बाहर निकाल रहा है















ये क्रेवास ! बहुत खतरनाक होते हैं ये









ये एक और क्रेवास ! बहुत खतरनाक होते हैं ये








पहुँच गए सतोपंथ ! प्रथम दर्शन कर लीजिये !


                                                                                                                    
                                                                                                           जारी रहेगी , साथ में रहिएगा