शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

Rumi Darwaza : Lucknow

लखनऊ की घुमक्कड़ी के किस्से को शुरू से पढ़ने के लिए यहां माउस चटकाएं या ऊँगली दबाएं !!

Satkhanda (सतखण्डा) :
समय की कमी थी और मैं ज्यादा से ज्यादा घूमना चाहता था , लखनऊ को और करीब से देखना चाहता था। तो छोटा इमामबाड़ा घूम लेने के बाद अब अगली मंजिल थी सामने ही नजर आ रहा सतखण्डा। सतखण्डा दो शब्दों से मिलकर बना है -सात + खण्ड यानि इस इमारत के सात खण्ड बनाये जाने थे। सतखण्डा एक सात मंजिल की गोल इमारत बनाई जानी थी लेकिन नवाब साहब की असमायिक मौत की वजह से ये आधी अधूरी ही बन पाई और इसके केवल चार ही मंजिल पूरे हो पाए। लाल रंग की ये इमारत सन 1840 के आसपास अवध के नवाब मुहम्मद अली शाह ने बनवानी शुरू की और फिर उनकी मौत के बाद 1880 ईस्वी में जाकर पूरी हुई। इस इमारत की कुल ऊंचाई 67 मीटर है और इसको बनवाने का जो उद्देश्य था वो वही था जो इमामबाड़े को बनवाने में था , यानि अकाल पीड़ित लोगों को काम उपलब्ध कराना। कुछ लग ऐसा मानते हैं कि नवाब साहब ने इसे अपने मतलब के लिए बनवाया था जिससे वो इस मीनार पर चढ़कर अपने शहर लखनऊ को पूरी तरह से देख सकें , लेकिन दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं कि इस ईमारत को मुस्लिमों के त्यौहार ईद के दिन चाँद देखने को बनवाया गया था , क्योंकि ये ईमारत उस वक़्त की लखनऊ की सबसे ऊँची मीनार हुआ करती थी तो संभव है कि ये मक़सद भी रहा हो इस मीनार को बनाने में। लेकिन सच क्या है ? भगवान जाने , और एक सच ये है कि आज ये इमारत हमारे सामने खड़ी है लखनऊ का इतिहास समेटे हुए। अब ये इमारत जिस भी उद्देश्य के लिए बनाई गई हो लेकिन इसके पूरे होते होते इसका उद्देश्य बदल गया और ये तब के उत्तर प्रदेश के गवर्नर रहे "जॉर्ज कूपर " के मेमोरियल के रूप में स्थापित हो गई। आप जब इस मीनार को गौर से देखेंगे तो आपको महसूस होगा कि इसकी स्थापत्य कला फ्रांस और इटली की पुरानी मीनारों से मिलती जुलती है।

सतखण्डा के पीछे जो लाल रंग की एक पुरानी सी बिल्डिंग दिखाई देती है वो एक म्यूजियम है जहां अवध के सभी नवाबों की आदमकद तसवीरें और उनसे सम्बंधित साजो -सामान रखे हैं। कुछ वक़्त यहां भी गुजारा जा सकता है और अवध के इतिहास को जानने -समझने का अवसर मिल सकता है। ज्यादा बड़ी जगह नहीं है ये , मुश्किल से एक घण्टा लगेगा और पास में ही घण्टाघर है। घण्टाघर आपके शहर में भी होगा लेकिन उसपर लगी हुई बड़ी सी घडी को आपने कभी चलते हुए , सही समय बताते हुए देखा है ? मैंने तो नहीं देखा लेकिन यहां लखनऊ के घण्टाघर की घडी बाकायदा चलती भी है और सही समय बताती है। मैं जब वहां था तब 4 :30 का समय था दोपहर बाद का। पहली बार घण्टाघर की घडी को अपने असली रूप में चलते हुए देखना स्वाभाविक रूप से प्रसन्नता और रोमांच का विषय हो सकता है।

Rumi Darwaza (रूमी दरवाज़ा) :

रूमी दरवाज़ा लखनऊ का एक प्रसिद्द स्थान है जिसके आसपास आपको बहुत सारे फोटोग्राफर अवध की शान को अलग -अलग एंगल से "कैप्चर " करते हुए मिल जायेंगे। इसे अवध के तीसरे नवाब असफ उद्दौला ने सन 1784 ईस्वी में अकाल पीड़ितों की मदद के लिए , उन्हें काम देने के मक़सद से बनवाया था। इसे उस समय के शानदार और विचित्र दरवाज़ा माने जाने वाले तुर्की के "बाब ए हुमाऊं " की तर्ज़ पर बनवाया गया था इसलिए इसे कभी कभी " तुर्किश गेट " भी कहते हैं। बाब , उर्दू में और शायद फ़ारसी में भी दरवाज़े को कहते हैं। जामिया यूनिवर्सिटी में , जहां से मैं पढ़ा हूँ , वहां भी ऐसे कई सारे "बाब " मिल जाएंगे देखने को। अभी एक का नाम याद आ रहा है "बाब ए ग़ालिब " !

रूमी दरवाज़ा सिर्फ अपनी बनावट के लिए ही विशिष्ट और अलग नहीं है अपितु इसमें जो ईंटों का उपयोग किया गया उसे लाइम के साथ मिलाकर लगाया गया है जबकि उस वक़्त ज्यादातर मीनार लाल पत्थर से से बनाई जाती थीं। इस दरवाज़े की ऊंचाई लगभग 60 फुट है।

इस दरवाज़े का नाम भले रूमी हो लेकिन इसका सम्बन्ध कवि रूमी से बिल्कुल नहीं है। रूमी का मतलब रोमन होता है तुर्की में और जिस समय तुर्की में रोमन साम्राज्य हुआ करता था उसी वक्त इस्ताम्बुल में उस गेट का निर्माण हुआ था , और वहीँ से इसका नामकरण हुआ "रूमी दरवाज़ा " !

तो अब शाम का धुंधलका अपना साया फैला रहा है और पूरे दिन अपना गुस्सा दिखाने के बाद सूरज बाबा अपने घर की ओर प्रस्थान करने को व्याकुल हैं। सुबह सात बजे से शाम पांच बजे तक लगातार काम कर रहे हैं सूरज बाबा , पूरे दस घंटे से अपना रौद्र रूप धारण किये हुए हैं , थक भी गए होंगे बाबा।

अब यहां के आंबेडकर पार्क चलेंगे , कहते हैं ये पार्क नॉएडा के राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल से ज्यादा सुन्दर और ज्यादा बड़ा है। नॉएडा का तो घूम चुका हूँ आज इसको भी देख लेंगे और फिर गोमती नदी का किनारा भी देखने का मन है। लेकिन इन सबसे पहले एक चक्कर हज़रत गंज का भी लगा के आऊंगा जहां से बीस साल पुरानी यादों का सम्बन्ध है। 
 इधर लखनऊ की अप्रैल की गर्मी से कुछ राहत मिली है और यहां मैं आज लिखने से राहत लेता हूँ :














एक झलक उन नेताओं के फोटो पर , जिनकी आजकल डिमांड है :) जो दिखता है वो बिकता है


बुधवार, 31 जनवरी 2018

Japanese Lesson No-8

Lesson No -8 
अगर आप जापानी भाषा के इन पोस्ट को शुरू से पढ़ना चाहते हैं तो कृपया यहां क्लिक करिये !! If you are interested to learn it from beginning, pl.Click here

こんにちは ともだち ( Konnichiwa Tomodachi- कोन्नीचिवा  तोमोदाची-Hallo Friends ) 

お げんきですか ?( O genki desu ka -ओ गेनकी देस का ? - How are you ? ) 


अब तक मैं सात क्लास लिख चुका हूँ और उम्मीद करता हूँ कि आपको कुछ तो समझ आया ही होगा 🙂 एक बार फिर से रिवाइज़ कर लीजिये जिससे Continuity बनी रहेगी। बहुत दिन के अंतराल के बाद आज फिर से भाषा यात्रा को शुरू कर रहा हूँ और उम्मीद कर रहा हूँ कि आपका साथ और सहयोग पहले की तरह ही मिलता रहेगा।

जापानी भाषा की पांच स्क्रिप्ट होती हैं जिसके बारे में पहले भी बता चुका हूँ , आज फिर से लिख देता हूँ : ये पांच स्क्रिप्ट हैं : There are five scripts in Japanese language : 

1 . हिरागाना ( Hiragana )

2 . काताकाना ( Katakana )

3 . रोमाजी( Romaji )

4 . कांजी ( Kanji)

5 . सूजी ( Sooji)

इन के विषय में पढ़ना चाहते हैं तो यहां क्लिक करिये और पहुँच जाइये इनके पेज पर।Want to read about all the scripts ? then click here


आज का जो पाठ है वो हिरागना का है। हिरागाना ( Hiragana ) जापान की भाषा का मौलिक रूप है जिसमें कुल 46 अक्षर हैं और एक दूसरे को मिलाकर कुल 71 अक्षर बन जाते हैं। अच्छा , हाँ जापानी भाषा को सीखने के लिए आप हिंदी में पारंगत होने चाहिए क्योंकि इसे लिखा भी हिंदी की तरह जाता है। बाएं से दाएं लिखते हैं , उर्दू और अन्य पर्शियन भाषाएं दाएं से बाएं लिखी जाती हैं। जापानी भाषा में पांच स्वर (Vowel ) होते हैं :  , ई , ऊ , ए और ओ ! आज इनको ही लिखना सीखेंगे और फिर आगे बढ़ेंगे। जापानी भाषा की प्रैक्टिस के लिए अक्षरों को बनाने के लिए स्ट्रोक आर्डर बहुत मायने रखता है , इसीलिए मैं आपको हर अक्षर का लिखने का तरीका , मतलब स्ट्रोक आर्डर भी साथ में बताता जाऊँगा। इतना विश्वास रखिये कि अगर आपको ये मजेदार भाषा सीखनी है तो बस रेगुलर रहिये। जल्दी ही आपको youtube पर मैं पाठ्यक्रम के वीडियो भी उपलब्ध कराऊंगा। लेकिन सबसे ज्यादा जरुरी है आपका interest और लगन। तो आइये , आज जापानी भाषा के vowels लिखना सीखते हैं :

Stroke Order  :

अ - a - あ


ई -i - い





ऊ -u -う




ए -e -え
ओ- O -お










और अब पूरा चार्ट एक साथ  :




Continue .......

बुधवार, 24 जनवरी 2018

Chhota Imambada : Lucknow

लखनऊ की घुमक्कड़ी के किस्से को शुरू से पढ़ने के लिए यहां माउस चटकाएं या ऊँगली दबाएं !! 


बड़ा इमामबाड़ा देख चुके हैं , अब छोटा इमामबाड़ा भी देख ही लिया जाय। हालाँकि ये छोटा इमामबाड़ा उतना ज्यादा प्रसिद्द नहीं है , भगवान जाने क्यों ? लेकिन मुझे तो खूबसूरत लगा। छोटा इमामबाड़ा लखनऊ के यानि अवध के तीसरे नवाब साहब मुहम्मद अली शाह ने 1838 ईस्वी में बनवाया था। ये असल में नवाब साब का अपनी माँ के प्रति प्रेम का प्रतीक है। नवाब साहब ने अपनी माँ की कब्र के पास ही अपना भी मक़बरा बनवाया था। लोग शाहजहां की झूठी मुहब्बत के झूठे प्रतीक ताजमहल को मुहब्बत की निशानी कहते नहीं थकते जबकि वास्तव में मुमताज़ महल 14 वें बच्चे को जन्म देने के चक्कर में मरी और उसके मरने के बाद शाहजहां ने मुमताज़ की बहन से शादी कर ली , तो कहाँ है इसमें मुहब्बत ? कैसी मुहब्बत ? ये शब्द परम मित्र और ब्लॉगर श्री मुकेश पाण्डेय चन्दन जी के हैं !! ताजमहल प्रेम की नहीं बल्कि औरत पर होने वाले अत्याचारों और शाहजहां की वासना की निशानी है। अगर मुहब्बत के निशाँ देखने हैं तो लखनऊ के इमामबाड़े देखिये जहां आपको एक नवाब को अपनी प्रजा से मुहब्बत की निशानी मिलती है या फिर छोटा इमामबाड़ा देखिये जहां एक नवाब , अपनी माँ के प्यार को पाने के लिए उसकी कब्र के पास ही दफ़न हुआ। और अगर बिना बच्चों को जन्म दिए , माँ और संतान का प्यार , निःस्वार्थ प्रेम देखना है तो वृन्दावन (मथुरा ) के आदरणीया दीदी माँ ऋतम्भरा जी के वात्सल्य ग्राम हो आइये।

छोटा इमामबाड़ा क्रिस्टल और फानूस से सजाया गया है और इसे देखकर यूरोपियन टूरिस्ट इसे " पैलेस ऑफ़ लाइट्स " कहते थे। ये जो फानूस इसमें लगाए गए हैं ये बेल्जियम से मंगवाए गए थे। और हाँ , इसे भी नवाब साब ने अकाल पीड़ित लोगों को मदद करने के लिए बनवाया गया था। इसके गुम्बद और कंगूरे शानदार लगते हैं। अंदर नवाब साहब और उनके परिवार के अन्य लोगों की कब्र हैं। यहां दो मक़बरे ताजमहल की सी आकृति में बने हैं जो नवाब साब की बेटी और दामाद के बताये जाते हैं।


तो आज इतना ही , लिखने को बहुत कुछ नहीं है इसलिए फोटो देखते जाइये : 



















आगे चलेंगे : 

सोमवार, 15 जनवरी 2018

The Labyrinth : Lucknow

भूलभुलैया : लखनऊ

लखनऊ की घुमक्कड़ी के किस्से को शुरू से पढ़ने के लिए यहां माउस चटकाएं या ऊँगली दबाएं !!


​बड़ा इमामबाड़ा देख चुका हूँ , यहां अच्छी खासी भीड़ है। शायद इतवार की वजह से हो ! हर एक कदम मुझे पिछली बार यहां आने की याद दिला देता है , तब मैं अपने दोस्तों के साथ था और आज अकेला हूँ। सीढ़ियों से ऊपर जाता हूँ लेकिन उधर से एक रेला सा चला आ रहा है , बुरका पहने कई सारी ख़्वातीन ​ऊपर से नीचे आ रही हैं तो लाजमी है कि नीचे से ऊपर जाने वालों को रुकना पड़ेगा। लखनऊ आइये तो एक बार बुरका स्टाइल और डिज़ाइन पर भी ध्यान दीजिये , आपको बड़े सलीकेदार बुर्के और सलीकेदार बुर्के वालियां दिखेंगी। तहज़ीब जैसे लखनऊ की दूसरी पहिचान हो , यहां की मुस्लिम महिलाएं शायद उत्तर प्रदेश की सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी महिलाएं होंगी। अब हमारा नंबर है ऊपर चढ़ने का , सीढ़ियां खूब चौड़ी हैं लेकिन फिर भी वन वे किया हुआ है ऊपर जाने -आने का रास्ता। जैसे ही सीढ़ियां शुरू होती हैं वहां एक बोर्ड लगा है जो "स्वच्छ भारत अभियान " का हिस्सा लगता है क्योंकि ये तब नहीं था जब हम पहले यहां आये थे 1997 में।


ऊपर भूल भुलैया है। अंग्रेजी में (the labyrinth ) कहते हैं। भूलभुलैया को आप लखनऊ की पहचान कह सकते हैं और कह क्या सकते हैं , है ही और तभी से है जब से ये नवाब साब ने बनवाया है। दो सौ साल से ज्यादा हो गए इसे बने हुए और आज भी ज्यों की त्यों जवान लगती है। हाँ कुछ कुछ ऐसे ही मेक अप उतर गया है जैसे किसी कमसिन ने मुंह धो लिया हो और क्रीम पाउडर की परत हट गई हो ! भूलभुलैया नाम से समझ में आ जाता है कि जहां आप खो जाएँ या रास्ता भूल जाएँ a place where you can forget directions and paths and get lost’.इसे बनवाने का किस्सा भी मजेदार और इंजीनियर की सोच का परिणाम है , ऐसा नहीं है कि यूँ ही बना दिया गया हो। ये किस्सा थोड़ी देर में सुनाता हूँ , उससे पहले ये बता दूँ कि इसमें एक जैसे 489 एक जैसे दरवाज़े हैं और एक जैसे हैं इसीलिए खो जाने का , रास्ता भूल जाने का डर रहता ही है। हालाँकि पता नहीं क्यों , भूलभुलैया मुझसे नफरत करती है , मैं हर बार यहां खो जाना चाहता हूँ , चिल्लाना चाहता हूँ कि मैं खो गया हूँ , कोई मुझे ढूंढ लो। .... लेकिन मैं कभी खोता ही नहीं। .... न इस बार। ... न तब ! I hate you Labyrinth क्योंकि तुम मुझे खोने नहीं देती but I love you too, I like you क्योंकि मुझे तुम्हें देखना , तुममें खो जाना पसंद है and so I am here in Lucknow in this summer . ये भी अच्छा है कि तुम केवल एक Structure वरना मेरी बीवी को तुमसे बड़ी नफरत होती !!

नवाब ! इधर यूपी में बहुत चलता है , मेरे अपने गाँव में भी ! किसी की लंका लगानी हो तो - बहुत बड़ौ नवाब है रह्यो है !! नवाब बन रहयो है !! जैसे मुहावरे प्रचलित हैं !!

पढोगे -लिखोगे बनोगे नवाब
खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब


पहले यही चलता था लेकिन अब असली नवाब वो हैं जो खेल में नाम कमा रहे हैं। नवाब लखनऊ में भी हैं , कुछ शायद काम के भी हों लेकिन ज्यादातर नाम के ही हैं। अपने नाम के आगे बस नवाब लिख लेने से ये खुद को नवाब मान लेते होंगे जैसे नवाब फलाने अली खां , नवाब ढिकाने अली खां ! नवाब शब्द असल में फ़ारसी भाषा के शब्द "नायब " से आया है जिसका मतलब होता है डिप्टी (Deputy ) ! नवाब मुग़ल काल में अपने Deputy के रूप में मुग़ल शासकों द्वारा तय किये जाते थे और ये शब्द ज्यादातर उत्तर भारत में ही प्रयोग किया जाता था। यहां थोड़ी सी नोट करनी वाली बात ये है कि नवाब केवल पुरुष बनाये जाते थे और महिलाओं को बेग़म का ताज नवाजा जाता था। खैर इतना इतिहास मुझे भी नहीं पता लेकिन 1857 की क्रांति के बाद इन नवाबों के बुरे दिन आने शुरू हो गए और अब आज की तारिख में इन्हें कोई नवाब नहीं मानता। होगा तू अपने घर का नवाब !!

अच्छा हाँ , भूलभुलैया के बनने की कहानी भी तो लिखनी थी। भूलभुलैया , इमामबाड़े की ऊपर वाली मंजिल पर बना है और इमामबाड़े की बात तो आप पहले पढ़ ही चुके है कि क्यों और कैसे बना। इमामबाड़ा ऐसी जगह होती है जहाँ शिया मुस्लिम विशेष दिन आकर इबादत करते हैं , शायद मुहर्रम के दिन। इमामबाड़े एशिया के दूसरे अन्य मुस्लिम देशों में भी हैं लेकिन इनके नाम अलग -अलग हैं। बहरीन और UAE में इन्हें 'मातम " कहते हैं जबकि सेंट्रल एशिया के देशों में इसे "तकियाखाना " कहते हैं !! संभव है , मैं कहीं गलत हूँ तो अगर आपको मेरे तथ्य गलत लगते हैं तो कृपया सुधार करें। आपका स्वागत है।

तो क्योंकि इमामबाड़ा एक बड़ा सा हॉल है जिसमें कोई बीम नहीं लगी तो इसकी Ceiling को हल्का रखना था और ऊपर कुछ बनाना भी जरुरी था , तब आर्किटेक्ट हाफ़िज़ किफ़ायतुल्लाह ने ये डिज़ाइन तैयार किया जो कुछ Hollow हो , और इस तरह से ये भूलभुलैया का डिज़ाइन दुनिया के सामने आया। और हाँ , ये भी उसी तरह से बनाया गया जैसे इमामबाड़ा बनाया गया , मतलब अकाल पीड़ित लोगों को काम देने के लिए , जैसे आज की तारीख़ में मनरेगा (MNREGA ) से लोगों को काम दिया जाता है।

अकेले घूमने का एक नुकसान रहता है कि कोई फोटू खींचने वाला नहीं मिलता , सेल्फी का ज्यादा शौक नहीं पाला कभी। एक को कैमरा दिया कि भाई एक फोटू खेंच दियो ! ले लिए फोटो - शोटो ! अब चलता हूँ बाहर -एक कोई बावली भी है और स्नानघर भी है मुग़लों के ज़माने का। हाँ , यहां भूलभुलैया के बाहर जो खुला -खुला सा है वहां से लखनऊ बहुत सुन्दर दीखता है , उसे मिस मत करना कभी जाओ तो।

शाही बावली , सामने ही है। जिस तरफ से आप भूलभुलैया गए थे उसी तरफ कुछ आगे जाकर है ये। बावली , आपको पता ही होगा कि पहले के समय में पानी इकठ्ठा करने के लिए बनाई जाती थीं। हिन्दू शासक भी खूब बावली बनवाते थे और उम्मीद करता हूँ आप ने दिल्ली में उग्रसेन की बावली तो देखी होगी। इसके अलावा भी दिल्ली में बहुत सी बावली हैं , चाहें तो मेरी पोस्ट पढ़ सकते हैं। मैंने पांच बावली देखी हैं दिल्ली में अब तक। इसे भी नवाब असफउद्दौला ने बनवाया था और डिज़ाइन भी हाफ़िज़ किफ़ायतुल्लाह ने ही किया था।

चलो जी ! अब आगे चलता हूँ छोटा इमामबाड़ा घूमने ! तब तक आप ये फोटो देखते जाओ :
बस यही बदलाव आया है 1997 में और 2017 में ! तब ये बोर्ड यहाँ नहीं होता था





Red Carpet से हमारा स्वागत !! मोगैंबो खुश हुआ :)
भूलभुलैया से नीचे का विहंगम दृश्य










शाही बावली