शनिवार, 10 सितंबर 2016

Satopanth to Swargarohini and Return

अगर आपको ये यात्रा वृतांत शुरू से पढ़ने का मन हो तो आप यहां क्लिक करिये, पहले ही पोस्ट से पढ़ पाएंगे !


शानदार सुबह है आज ! अंग्रेजी कैलेण्डर  के अनुसार आज 16 जून 2016 का दिन है , होता रहे लेकिन मेरे लिए आज हिन्दू कैलेण्डर ज्यादा मायने रखता है ! आज एकादशी है , जी , एकादशी ! और आज के दिन त्रिदेव भगवान शिव , विष्णु और ब्रह्मा जी स्नान करने आएंगे इस पवित्र सरोवर "सतोपंथ " में ! न तो मैं दिव्यात्मा हूँ और न हमारे ग्रुप में मुझे कोई लगा , जिसे इन तीनों भगवान में से किसी एक के भी दर्शन हुए हों !


रात बीनू भाई की तबियत कुछ गड़बड़ा गयी तो उन्होंने सुबह सुबह ही वापस उतर जाने का प्लान बना लिया और बीनू भाई के साथ सुमित भी उतर जाएंगे ! आठ बजे के आसपास वो दोनों चाय नाश्ता लेकर नीचे की तरफ चल दिए ! कुछ ने स्वर्गारोहिणी की तरफ जाने की हिम्मत नही दिखाई और वहीँ आराम किया ! आखिर मैं , अमित तिवारी , जाट देवता संदीप भाई , सुशील जी और विकास नारायण , गाइड गज्जू भाई को लेकर स्वर्गारोहिणी की तरफ बढ़ चले ! सतोपंथ से मुश्किल से 500 मीटर चलने के बाद बहुत ही खतरनाक धार पर चलना पड़ा ! इतनी शार्प धार कि बाएं तरफ फिसले तो लुढकते लुढकते जान जाएंगी और दाएं तरफ कैसे भी शरीर का बैलेंस बिगड़ा तो बर्फ में बने छोटे छोटे गड्ढे अपने में दबा लेंगे ! बस जैसे तैसे उस पॉइंट तक पहुंचे जहां एक लाल रंग की झंडी लगी थी , जो ये बता रही है कि आप स्वर्गारोहिणी पहुँचने वाले हो लेकिन वास्तव में स्वर्गारोहिणी अभी यहां से 1 -1. 5 किलोमीटर दूर होगी ! अमित भाई हमेशा तेज चलते हैं तो स्वाभाविक बात है कि वो सबसे पहले वहां पहुँच गए और जब तक हम लोग पहुंचे वो स्वर्गारोहिणी की तरफ कदम बढ़ा चुके थे ! इस लाल झण्डी से लेकर स्वर्गारोहिणी तक "चन्द्र कुण्ड " " सूर्य कुण्ड " और " विष्णु कुण्ड " नाम के तीन कुण्ड देखने को मिलेंगे लेकिन हमारी हिम्मत आगे का रास्ता देखकर खत्म हो रही है ! आगे बहुत - बहुत कठिन रास्ता नजर आ रहा है जिस पर जगह जगह बड़े बड़े क्रेवास , बोल्डर दिखाई दे रहे हैं ! हम बस अमित भाई को जाते हुए देख रहे हैं और उनके पीछे गज्जू भाई को !

आपने टीवी चैनलों पर स्वर्गारोहिणी पर्वत को जरूर देखा होगा जिसमें वो स्वर्ग की सीढियां दिखाते हैं , वो मुझे नही लगता कि वहां तक जाते होंगे बल्कि इसी झण्डी पर रूककर यहीं से अपना कैमरा ज़ूम करके उन सीढ़ियों की शूटिंग कर लेते होंगे , उनके कैमरे वैसे भी बहुत बढ़िया क्वालिटी और बहुत ज्यादा ज़ूम के होते हैं ! हमारे चैनल वालों में न इतनी हिम्मत है और न इतनी फिटनेस कि वो ऐसे रास्तों को नाप भी सकें , जहां हर कदम मौत "क्रेवास " के रूप में "ट्रैप " लिए हुआ आपका इंतज़ार कर रही है ! हमारे टीवी चैनल वाले बस राजनीतिक बहस कर सकते हैं , कि केजरीवाल ने क्या कहा ? मोदी ने क्या कहा ? अब चैनल वालों को किसने क्या किया से ज्यादा इस बात की फ़िक्र रहती है कि किसने क्या कहा ? लेकिन फिर भी बेहतर है कभी कभी तो ये ऐसे दुर्गम स्थानों की यात्रा करा ही देते हैं !!

स्वर्गारोहिणी वो जगह है जहां से युद्धिष्ठर अपने कुत्ते के साथ शरीर सहित स्वर्ग गए थे , और यहां उनके लिए स्वर्ग से स्वयं धर्मराज उन्हें लेने आये थे ! इस पर्वत पर जहां हमेशा बर्फ होती है , तीन - चार सीढ़ियों जैसी आकृति दिखाई देती है और उन्हें हम स्वर्ग की सीढियां मानकर नमन कर लेते हैं ! हमने भी वहीँ झण्डी वाली जगह से दूर से , हाथ जोड़कर इन सीढ़ियों को नमन कर लिया और अमित भाई को उस रास्ते पर आगे जाते हुए देखकर वापस मुड़ आये !

वापस सतोपंथ आकर कुछ खाया , दो लोग पहले ही नीचे की ओर जा चुके थे , अमित भाई स्वर्गारोहिणी की तरफ चले गए , बाकी हम जितने भी बचे , सब नाश्ता पानी लेकर सतोपंथ को अलविदा कह रहे थे ! मैंने मुड़ मुड़कर दो तीन बार उस पवित्र ताल को देखा और अपने आपको थोड़ा सा गौरवान्वित महसूस किया ! भगवान को धन्यवाद देने का मन किया तो सबसे पीछे कुछ देर रुककर , उस पवित्र ताल और उस परमपिता परमेश्वर के सम्मान के लिए अपना सिर झुकाकर नमन किया ! सुबह के साढ़े नौ या दस बजे होंगे ! वापस चलते हैं ! और वापसी में लक्ष्मी वन तक उतर जाने का मन है !


ओह ! सतोपंथ से नीचे उतरते ही पाँव फिसल गया और मुड़ गया है ! बहुत दर्द हो रहा है , चलना एकदम मुश्किल ! आयोडेक्स लगा लिया , कपड़ा भी बाँध लिया लेकिन दर्द कम नही हो रहा ! चलने की स्पीड बहुत कम है लेकिन क्योंकि हम उतर रहे हैं इसलिए ज्यादातर दबाव एड़ी पर नही , पंजों पर आ रहा है ! एक दो बुजुर्ग से लोगों को नीचे की तरफ से आते हुए देखता हूँ तो हौसला और भी बढ़ जाता है ! कुछ महिलाएं भी अपना स्टेमिना आजमा रही हैं या फिर अपनी श्रद्धा को पुनः परिभाषित कर रही हैं , वो ही जानें ! चक्रतीर्थ निकल गया है , जहां हम एक रात पहले रुके थे लेकिन आज अभी और चलना है और अभी टाइम भी बहुत है अपने पास ! मुश्किल से दोपहर के 12 बज रहे होंगे ! लेकिन जैसे ही चक्रतीर्थ वाली पहाड़ी से नीचे की तरफ उतरने लगा , बारिश होने लगी ! तुरन्त बैग में रखा पोंचू निकाला , लेकिन जल्दी जल्दी में पोंचू की बांह फट गयी ! जिस दिन यहां से गुजरे थे , मौसम बिलकुल साफ़ था , और यहां संजीव त्यागी जी ने स्नान भी किया था , लेकिन आज सब जगह पानी ही पानी था , रास्ता भी नही दिख रहा था तो फिर से ऊपर चढ़ना पड़ा , जहां बड़े बड़े पत्थर थे ! एक बार आगे चल रहे लोगों ने हाथ हिलाकर कुशल क्षेम भी पूछ ली , लेकिन फिर उसके लगभग आधा घंटे तक कोई नही दिखा , मैं इतनी भयंकर बारिश में अकेला ही चलता रहा ! अब तक का सबसे कठिन समय था ये इस यात्रा का ! पैर में भयानक दर्द , ऊपर से भयानक बारिश और रास्ते का कोई अंदाज़ा नही ! परेशानी के बादल जल्दी ही छंट गए , ऊपर बारिश बंद हो गयी और नीचे कमल भाई दूर बैठे इंतज़ार करते हुए दिखाई दे गए ! बाकी लोग आगे जा चुके हैं ! सब लक्ष्मी वन पर मिल जाएंगे ! धीरे धीरे चलते हुए , अलका पूरी पहुँच गए ! पीछे से अमित भाई भाई अपनी घोड़े वाली चाल से चले आ रहे थे ! उनका जूता खून से भरा हुआ था ! वो जब स्वर्गारोहिणी गए थे तब उन्हें भयंकर चोट लग गयी और उनका पैर फट गया था , लेकिन बंदे की चाल पर कोई फर्क नही पड़ा ! थोड़ी देर में ही हमसे आगे निकल गए !

मैं और कमल भाई आराम आराम से चलते रहे , एक जगह आकर दो तीन टेंट दिखाई दिए जिनमें शायद कपल थे , उनकी आवाज़ सुनकर ऐसा ही महसूस हो रहा था ! उसी गुफा के पास जहां बीनू भाई को गुफा में बिल्ली दिखाई दी थी ! वो लक्ष्मी वन दिखाई दे रहा है , आज भारी बारिश की वजह से छोटे छोटे झरने भी पूरी तेजी से बह रहे हैं और उन्हें पार करना मुश्किल सा हो गया है !

लक्ष्मी वन पहुँच गए हम भी , जहां पहले से और लोग भी आये हुए हैं ! हाँ , बीनू बाबा और सुमित नौटियाल यहां नही हैं , वो लोग आज ही बद्रीनाथ तक उतर गए होंगे ! शाबाश ! एक ही दिन में 28 किलोमीटर ! बढ़िया ! लक्ष्मी वन पर कल एक नए बाबा ने ठिकाना बना लिया है जिनका आश्रम अभी निर्माणाधीन है ! थका हुआ हूँ , जल्दी खा पीकर सोना चाहता हूँ !! 


फिर मिलेंगे जल्दी ही:





स्वर्गारोहिणी


इन रास्तों पर ऐसे चोर बहुत मिलते हैं




इन रास्तों पर ऐसे चोर बहुत मिलते हैं



स्वर्गारोहिणी






रास्ता दिख रहा है कहीं ? अमित भाई इसी रास्ते से गए थे स्वर्गारोहिणी











पीछे स्वर्गारोहिणी है


सीढियां दिखी क्या ?

















ये फिर से सहस्त्रधारा पहुँच गए


ये फिर से सहस्त्रधारा पहुँच गए




हम स्वर्गारोहिणी तो नही पहुँच पाए , झंडी पकड़ के ही फोटो खिंचवा लेते हैं


ये तसवीरें हमेशा याद रहेंगी !!

शनिवार, 27 अगस्त 2016

Old Indian currency system

एक आईडिया अगर जिंदगी बदल सकता है तो एक विषय , एक टॉपिक दिमाग को घुन लगाने के लिए काफी है ! व्हाट्स एप्प पर नीरज अवस्थी जी की एक छोटी सी पोस्ट आई इस विषय से सम्बंधित,  और मन में ये बात बैठ गयी कि टॉपिक न केवल मनोरंजक रहेगा बल्कि जानकारी से भरा भी होगा ! उस दिन से जितना भी समय मिलता गूगल चाचा के कान में ऊँगली कर देता , चचा बताओ ! चचा बताते तो फिर चुल्ल उठती , चचा थोड़ा और बताओ ! कॉलेज में मुफ्त के ब्रॉडबैंड और मुफ्त का Wi-Fi , लेकिन समय की कमी ! आखिर गूगल चाचा के कान में ऊँगली करते करते पाकिस्तान के ब्लॉगर के ब्लॉग तक भी पहुँच गया ! उर्दू की थोड़ी समझ है , जितनी अंग्रेजी की है , उससे कुछ ज्यादा कह सकते हो ! अगर अंग्रेजी में 10 में से तीन नम्बर आएंगे तो उर्दू में साढ़े तीन ! 





विषय भी क्या था - आपने अच्छी तरह सुना होगा और कहा भी होगा ! पहले सोचिये , याद करिये , कभी आपने ये शब्द किसी को कहे हैं या किसी ने आपसे कहे हैं ?  वैसे ऐसे शब्द प्राइवेट नौकरी में बॉस अपने अधीन कर्मचारी से , दूकान मालिक अपने नौकर से और घर में माँ बाप अपने बेटे से खूब कहते हुए मिलेंगे ! ये मुहावरे देखते हैं :


"चमड़ी जाये पर दमड़ी ना जाए"               “Chamri jae par Damri na jae”

" कौड़ी के मोल बिकना "                           “Cowrion ke mol bikna”

"इसके पास तो एक फूटी कौड़ी भी नही है "     “Is ke paas to ek Phooti Cowri bhi nahi hai”

"ये लड़का तो एक धेले का भी काम नही करता "
“yeh ladka to ek Dhelay ka bhi kaam nahi karta hai ”



सुनी हैं न ये सब कहावतें ? सुनी होंगी यार सबने , कौन सा आप इंग्लैंड से आये हो ? हाहाहा ! और मुझे पूरा भरोसा है कि आपने ये वाली कहावतें भी जरूर सुनी होंगी !


" इसे तो मैं एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा अपनी जायदाद में से "
" ise to main ek 'phooti cowrie' bhi nahin doonga apni jaaydaad mein se ..

" हमारी बहु तो पूरा दिन बस टीवी देखती रहती है , धेले भर का काम नही करती "  
" Hamari bahu to poora din bas TV dekhti rahti hai , dhelay bhar ka kaam nahi karti "

"पाई पाई का हिसाब दे दूंगा " 
" Pie Pie ka Hisab de dunga "
कभी ये सोच में आया कि ये शब्द आये कहाँ से ? वैसे जहां सोच वहां ......... ? जो सोचना है सोच लो ! तो ये शब्द असल में हमारी पुराने जमाने की मुद्रा (Currency ) से आये हैं ! मतलब आज के जमाने की तरह पुराने समय में पैसा , रुपया नही बल्कि कौड़ी , फूटी कौड़ी , दमड़ी , धेला , पाई ये सब चलते थे !


तो आज का विषय यही है भाई , भारत देश की पुरानी मुद्रा ! आज आप जो रुपया देखते हो , पैसा देखते हो वो बहुत देर में , बहुत मॉडिफिकेशन के बाद आया है ! विश्व में सबसे पहले सिक्का (Coin ) भारत के प्राचीन मौर्या शासन काल में लगभग 6 वीं सदी में शुरू हुआ था और वहीँ से रुपया आया ! रुपया ,संस्कृत शब्द "रूप" से आया है ! मौर्य वंश में जो सिक्के प्रचलित थे उन पर किसी न किसी जानवर या भगवान की आकृति छपी रहती थी।, आकृति मतलब उसका रूप और वो ही रूप आगे चलकर रुपया हो गया ! इसी सिक्का मुद्रा को आगे मुग़ल लोगों ने भी जारी रखा लेकिन पहले जो आकृति इन पर अंकित की जाती थी उसकी जगह उर्दू -फ़ारसी में उस शासक का नाम लिखा जाने लगा ! फिर 1540 ईसवी के आसपास शेर शाह सूरी ने अपने सिक्के जारी किये ! हालाँकि इस बीच बहुत से शासकों ने अपने अपने सिक्के चलवाये जो चमड़े से लेकर सोने तक के बने हुए थे लेकिन वो ज्यादा प्रचलित नही हो सके !

ये जो फूटी कौड़ी होती थी वो ऐसा नही है कि बाबा आदम के जमाने में चलती होगी , ये मुद्रा यानि कौड़ी बंगाल -ओडिशा में 19 वीं शताब्दी तक प्रचलन में रही है ! हालांकि तब बाकी जगह कॉपर के सिक्के चलते थे लेकिन कौड़ी की प्रसिद्धि इतनी थी कि कोई ताँबे के सिक्के लेता ही नही था और अगर आप उस वक्त , मतलब  लगभग 1821 ईसवी में कौड़ी की  कीमत देखें तो एक रूपये में 2560 कौड़ी आती थीं !

Old Indian currency system


Phootie Cowrie to Cowrie           फूटी कौड़ी से कौड़ी
Cowrie to Damri                          कौड़ी से दमड़ी
Damri to Dhela                           दमड़ी से धेला
Dhela to Pie                                धेला से पाई
Pie to to Paisa                            पाई से पैसा
Paisa to Rupya                           पैसे से रुपया
256 Damri (दमड़ी ) = 192 Pie (पाई ) = 128 Dhela (धेला ) = 64 Paisa (old) (पुराने पैसे ) = 16 Anna (आना )  = 1 Rupya (रुपया ) 


 तो मिलते हैं फिर जल्दी ही  , तब तक आप चाहो तो ये फोटू भी देखते जाओ:






फूटी कौड़ी
Phootie Cowrie

कौड़ी cowrie


धेला dhelaa

पाई pie

आना aanaa






खुश रहिये , मजे करिये ! राम राम












बुधवार, 24 अगस्त 2016

Satopanth Yatra : Satopanth Taal

अगर आपको ये यात्रा वृतांत शुरू से पढ़ने का मन हो तो आप यहां क्लिक करिये, पहले ही पोस्ट से पढ़ पाएंगे !

सतोपंथ ! जब से इसके विषय में पढ़ा , जाना , समझा तब से सपनों में बसा था , आज इस पवित्र ताल पर पहुंचकर मन को जो प्रसन्नता मिली , उसे केवल महसूस किया जा सकता था , लिखना शायद मुश्किल होगा ! दोपहर बाद के साढ़े तीन का समय हो रहा है ! एकदम से भीड़ सी दिख रही है यहां , कई सारे तम्बू लगे पड़े हैं ! हरियाली भी दिखी , एक नहीं दो -तीन ! उनके साथ बहुत सारे पोर्टर हैं जो मशीन लाद लाद कर लाये हैं ! हरियाली से बस इतना ही पूछ पाया - फ्रॉम वेयर यू आर ? न्यूज़ीलैण्ड ! इतने में उसका नाश्ता आ गया तो मैं चल दिया कि कहीं हरियाली ये न समझ ले कि मैं उससे चिपकने की कोशिश कर रहा हूँ ! खैर वो मशीन ग्लेशियरों का अध्ययन करने की मशीन थीं और वो हरियाली भूगर्भ वैज्ञानिक ! जल्दी ही तामझाम समेट लिया उन लोगों ने और आगे की तरफ बढ़ गए , आगे मतलब स्वर्गारोहिणी की तरफ ! आज की रात भी सूखी गुजरेगी ! कोई नही ! ओह , और लोगों ने भी अपना टंडीला इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है , इसका मतलब आज सतोपंथ पर हम ही रहेंगे , हाँ अमन बाबा तो हमेशा ही यहां रहते हैं !

अमन बाबा की भी बात कर लें कुछ ? आपने 2016 से पहले के जितने भी सतोपंथ के ब्लॉग या आर्टिकल पढ़े होंगे उनमें आपने पढ़ा होगा कि वहां एक "मौनी " बाबा भी रहते हैं जो किसी से बात नही करते लेकिन अब उन मौनी बाबा की जगह पर एक नौजवान बाबा "अमन बाबा " सतोपंथ पर रहते हैं , और उसी "महल " में रहते हैं जहां मौनी बाबा रहते थे ! हमारे सतोपंथ पहुँचने से पहले अमित तिवारी जी अमन बाबा से मुलाक़ात कर आये थे और शायद वो सन्देश भी अमन बाबा को दे दिया था जो अमन बाबा की माँ ने भिजवाया था ! सन्देश ये था कि अमन बाबा की कहीं सरकारी नौकरी लग गयी है ! हम भी अमन बाबा के "महल " में होकर आये ! महल इसलिए कहा कि ऐसी दुर्गम जगह पर उन्होंने रहने का जो स्थान बना रखा है अत्यंत साफ़ सुथरा और व्यवस्थित है ! बाहर वाला "कमरा " आने जाने वाले दर्शनार्थीयों के लिए है जबकि अंदर वाला ' कमरा " बैडरूम का काम करता होगा ! एकदम साफ़ सुथरा और सजा हुआ बैडरूम !


अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं , अमन बाबा के चक्कर में कहाँ पहुँच गए ? तो जी , हमारे पहुँचने से पहले सभी पॉर्टर और ज्यादातर साथ वाले लोग सतोपंथ पहुँच गए थे और जो झंडी तक पहुँचता वो जोर से चिल्लाता जैसे कोई अजूबा देख लिया हो ? हाँ , अजूबा ही तो था जो सामने त्रिकोण दिख रहा था सतोपंथ ताल के रूप में ! जब तक हम पहुंचे , गज्जू भाई एंड पार्टी ने मस्त गर्मागर्म सूप बनाकर तैयार कर दिया ! दो गिलास खेंच दिए ! मजा आ गया ! अब तम्बू गाढ़ लेते हैं , गढ़ गया तंबू भी ! बम्बू नही है हमारे पास इसलिए वो गाना " हम तो तंबू में बम्बू लगाय बैठे .. ....... गाने का कोई फायदा नही ! नहाने चलते हैं , तीन दिन से नहाया नही और इस पवित्र ताल में स्नान करना स्वयं में फलदायक रहेगा ! तो हो जा बेटा योगी तैयार , ठण्डे बर्फीले से पानी में डुबकी लगाने को ! लो जी , तैयार और मार ली 5 -7 डुबकी ! सारे पाप धुल गए लेकिन सच कहूँ तो ज्यादा पाप नही किये अभी तक !


कुछ खा पीकर इस पवित्र ताल की परिक्रमा को चलते हैं ! पहले कौन गया , कौन गया ? याद नही आ रहा ! शायद अमित भाई निकले थे , फिर विचित्र आत्मा विकास नारायण श्रीवास्तव फिर बीनू भाई , जाट देवता संदीप भाई , सुमित नौडियाल , सुशील जी और फिर मैं ! किनारे किनारे चलते हुए दूसरे कोने पर जा पहुंचे जहां से टूटे हुए ग्लेशियर बिल्कुल साफ़ दिख रहे थे , हालाँकि रास्ते में ग्लेशियर टूटने की आवाज़ें खूब आती रही लेकिन पिछले 2 -3 घंटे से सब शांत है , कहीं तूफ़ान से पहले की सघन शांति तो नही ? परिक्रमा ख़त्म होने से पहले हल्की हल्की बारिश होने लगी थी तो एक जगह पत्थर की ओट लेकर छुप गए ! लेकिन जैसे ही थोड़ा ऊपर की तरफ पहुंचे तो बारिश फिर से आ गयी और इस बार तेज थी ! बड़े बड़े पत्थर , कोई रास्ता नही , एक गुफा में जैसे तैसे सरक सरक के घुस गए ! आधा घण्टा वहीँ बीत गया ! ये भी अच्छी जगह है रात बिताने को ! वापस धीरे धीरे करके उस जगह पहुंचे जहां आज गज्जू भाई ने अपना कब्जा जमा रखा है ! ये कभी कोई आश्रम रहा होगा , लेकिन आज इसमें हमारा किचन बना हुआ है और जाट देवता तथा सुमित भाई ने भी अपना डेरा यहीं डाल लिया है आज की रात !


मैं भी कुछ देर इसी फाइव स्टार होटल में पड़ जाता हूँ ! मैं वहां घंटे भर के आसपास रुका होऊंगा लेकिन इस घण्टे भर में दो बार गिलास भर भर के चाय खेंच गया ! मौजा ही मौजा ! अपने घर , यानि अपने तम्बू में लौट चलते हैं ! रात के 10 बजे हैं , बीनू भाई की तबियत खराब सी हो रही है , बाकी न जाने क्या बेच के सो रहे हैं ! पता नही आज कोई लाद खेलेगा कि नही ! सुबह कुछ लोगों को स्वर्गारोहिणी की यात्रा करने जाना है , जहां वो चंद्रताल , सूर्यकुंड और विष्णुकुंड तक जाने का प्लान बनाये हुए हैं ! कल की कल देखेंगे, अभी तो सोने चलते हैं इस बियाबान में , जहां आज हम लोगों के अलावा और कोई नही , हैं तो सिर्फ सोये हुए पहाड़ , शांत -चिरशांत सा प्रतीत होता सतोपंथ और सामने करीब 3 किलोमीटर दूर स्वर्ग के द्वार तक पहुंचाने वाली सीढियां यानि स्वर्गारोहिणी ! 

तो कल मिलते हैं फिर से : 






सतोपंथ पर एक छोटा सा मंदिर भी है







पूरी टीम ! न न इसमें मैं और विकास नही हैं

विकास इसमें भी नही है ! बाएं से संजीव त्यागी , सुमित नौटियाल , कमल कुमार सिंह , मैं (योगी ), अमित तिवारी , जाट देवता , सुशील कैलाशी , बीनू कुकरेती आगे लाल लाल

पवित्र सतोपंथ का पवित्र जल












पीली चौंच का कौवा







हमारा सतोपंथ का फाइव स्टार होटल




                                                                                             आगे जारी है :