बुधवार, 15 जुलाई 2015

​बद्रीनाथ यात्रा : गाजियाबाद से ऋषिकेश

जून का महीना ऐसे तो बहुत गर्मी लेकर आता है लेकिन मन में खुशियां भी लाता है। और दो लोगों के चेहरे तो चमक दमक से भरे रहते हैं। ये वो दो लोग कौन हैं ? जी एक तो बच्चे जिन्हे स्कूल से छुट्टियां मिल जाती हैं और दूसरे वो जो कॉलेज या स्कूल में नौकरी करते हैं , उन्हें भी बिना किसी झंझट के कुछ दिन तो ऑफ मिल ही जाता है। जैसे ही यूनिवर्सिटी के पेपर और प्रैक्टिकल का काम ख़त्म हुआ मैंने तुरंत अपना ब्रेक ले लिया। प्लानिंग पहले से ही थी कि बद्रीनाथ जाना है। ब्रेक बहुत सोच समझ कर लिया था , सोचा था 13 जून की शाम को गाज़ियाबाद से निकल जाऊँगा ऋषिकेश के लिए लेकिन उसी दिन कॉलेज में ही घर से फोन आ गया कि हमारी धर्मपत्नी जी के पूज्य पिताजी और हमारे ससुर जी की तबियत खराब हो गयी है और वो खुर्जा से गाज़ियाबाद पहुँच गए हैं और यशोदा अस्पताल में भर्ती हैं। अब इतना बुरा तो मैं नही हूँ कि वो बीमार हों और मैं वहां न होऊं। इसलिए कुल मिलाकर मैं शुक्रवार यानि 13 जून के बजाय सोमवार 16 जून को गाज़ियाबाद से ऋषिकेश के लिए निकल पाया। मुझे पैसेंजर ट्रेन से यात्रा करनी थी। उसका कारण ये था कि एक तो मेरे पास समय की कोई कमी नहीं थी और दूसरा मैं इस रूट को बेहतर समझना चाहता था और हर स्टेशन के फोटो भी खींचना चाहता था। हालाँकि मैं एक बार पहले भी 2007 में बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब गया हूँ लेकिन तब धर्मपत्नी साथ थीं इसलिए एक्सप्रेस ट्रेन से ही जाना पड़ा था।


दिल्ली- सहारनपुर पैसेंजर का गाज़ियाबाद स्टेशन पर निर्धारित समय 2 बजकर 15 मिनट का है लेकिन कभी भी ढाई बजे से पहले अपना मुंह नही दिखाती। उस दिन भी अपने रुतबे में ही रही और 2 बजकर 35 मिनट पर पहुंची। जगह मिलने का कोई मतलब ही नही था और जगह चाहिए भी नही थी क्योंकि फिर फोटो नही ले पाता। मेरठ सिटी स्टेशन पर जाकर जगह मिल गयी और अपनी पसंद वाली खिड़की वाली सीट कब्ज़ा ली। अब तक गाज़ियाबाद , नया गाज़ियाबाद , गुलधर , दुहाई हॉल्ट , मुरादनगर , मोदी नगर , मोहिउद्दीनपुर, परतापुर स्टेशन निकल चुके थे। अगला स्टेशन आया मेरठ सिटी और फिर मेरठ छावनी , ट्रेन आधी से ज्यादा खाली हो गयी। यहां एक कप चाय भी पी। अँधेरा शुरू हो गया था और छोटे छोटे स्टेशन एक एक कर निकल रहे थे -पाबली ख़ास , दौराला , सकौती टांडा , खतौली , मंसूरपुर। मंसूरपुर में चीनी मिल है और मोदी नगर और मोहिउद्दीनपुर में भी चीनी मिल है। ये पश्चिम उत्तर प्रदेश का बहुत ही उपजाऊ और धनी इलाका है लेकिन कुछ वर्षों से इधर आपसी वैमनस्य बहुत बढ़ गया है। ये पूरा इलाका गन्ने की खेती के लिए बहुत प्रसिद्द है इसीलिए यहां बहुत सी चीनी मिल हैं। निजी क्षेत्र की भी और सरकारी क्षेत्र की भी। मंसूरपुर से आगे का स्टेशन जरौदा नारा आता है और फिर मुजफ्फरनगर। मुजफ्फरनगर पहुँचते पहुँचते ट्रेन पूरा एक घण्टा देरी से चल रही थी लेकिन हमें क्या लेना ? हमें तो बस कैसे भी अभी सहारनपुर तक पहुंचना है और फिर ऋषिकेश। बामनहेड़ी , रोहना कलां , देवबंद , तल्हेरी , नांगल और टपरी जंक्शन होते हुए , रोते हुए आखिर लगभग रात को 9 बजे सहारनपुर पहुँच पाई ये दिल्ली सहारनपुर पैसेंजर। लेकिन जैसे ही प्लेटफार्म पर उतरा और बाहर निकलने लगा तो देखा,  पता नही कहाँ से भयंकर रैला चला आ रहा है लोगों का। किसी से पूछा आज कोई रैली थी क्या इधर ? नही भाई ! फिर ये भीड़ ? कल मावस ( अमावस ) है सब नहान के लिए हरिद्वार जा रहे हैं। ओह , इसका मतलब भीड़ से सामना होने वाला है हरिद्वार तक। सहारनपुर से हरिद्वार 80 किलोमीटर है। और सहारनपुर से ऋषिकेश के लिए पैसेंजर गाडी है रात को ग्यारह बजे। वो ही जो दिल्ली से आती है और गाजियाबाद पर शाम को छह बजे आती है। मैंने सोचा अगर ढाई बजे चलकर पैसेंजर ट्रेन रात को 9 बजे पहुँच रही है यानि साढ़े छह घंटे लगा रही है तब ये दूसरी वाली क्या उड़ के आ जाएगी ? खैर जब आएगी तब आ जाएगी अभी तो घर से लाया हुआ खाना खाते हैं और एक कप चाय पीते हैं। बैठने की थोड़ी जगह मिली तो खाना खोल लिया।


वापस स्टेशन लौटा तो पता चला दिल्ली से चलकर हरिद्वार के रस्ते ऋषिकेश को जाने वाली सवारी गाडी अपने निर्धारित समय से एक घंटे की देरी से चल रही है। एक घंटा देरी से मतलब ये हुआ कि इसका निर्धारित समय है रात को 10 बजकर 50 मिनट और एक घंटा और मतलब 11 बजकर 50 मिनट। कोई मतलब ही नहीं कि साढ़े बारह से पहले पहुँच जाए। थोड़ा सा लेट मार लेता हूँ। थोड़ी देर बाद एक और घोषणा हुई , फलां फलां यानि यही वाली ट्रेन प्लेटफार्म संख्या 3 पर पहुँच रही है। प्लेटफार्म की घडी की तरफ देखा तो अभी तो 11 बजकर 55 मिनट हुए थे और गाडी समय पर आ पहुंची भले निर्धारित समय पर नही हो। अब यही ट्रेन सहारनपुर से ऋषिकेश हरिद्वार होते हुए जायेगी। भीड़ का रेला अपने पूरे जोश में था और इतना जोश में था कि लोगों को उतरने तक का मौका नही देना चाहता था। मैंने खिड़की से अपना छोटा सा बैग एक सिंगल सीट पर डाल दिया लेकिन इसका भी कोई ज्यादा फायदा नही हुआ और हरिद्वार तक एक आदमी के बैठने की सीट पर तीन आदमी बैठकर गए। सहारनपुर से निकलने के बाद बलिआखेड़ी , चुड़ियाला , इकबालपुर , रूड़की , ढंढेरा , लण्ढौरा , दौसनी और लस्कर जंक्शन निकल गए। इसमें रूड़की वो जगह है जहां आई आई टी है और जहाँ का सिविल इंजीनियरिंग का स्कूल कभी एशिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता था , अब क्या स्थिति है मुझे नही मालुम। लस्कर के बाद ऐथल , पथरी , इक्कर, ज्वालापुर और फिर हरिद्वार। हरिद्वार पर गाडी बिलकुल खाली हो गयी। और इतनी खाली हो गयी कि ऋषिकेश जाने वाले कुल तीन लोग थे डिब्बे में। उनमें से भी एक रायवाला उतर गया। आखिर मोतीचूर , रायवाला , वीरभद्र को पार करते हुए साढ़े पांच बजे ऋषिकेश पहुंचे। ऋषिकेश में हल्की हल्की बारिश हो रही थी जिससे मौसम सुहावना हो रहा था और ऐसे में जब आप आदमियों के समुद्र में से निकलकर आ रहे हों तब ऐसा मौसमऔर भी खुशगवार लगता है। 

आज इतना ही , अगली पोस्ट में ऋषिकेश के कुछ चुनिंदा दर्शनीय स्थल देखेंगे !! 







धन्यवाद सहित ये फोटो ब्लॉगर मित्र AJ  जी की है !!
धन्यवाद सहित ये फोटो जाने माने ब्लॉगर मित्र नीरज जाट की खींची हुई है !!

धन्यवाद सहित ये फोटो ब्लॉगर मित्र पवन गुप्ता जी की है !!








                                                                                                  

                                                                               उत्तराखंड यात्रा अभी शुरू हुई है , आगे भी जारी रहेगी


नीलकण्ठ महादेव मंदिर :ऋषिकेश 

ऋषिकेश से जोशीमठ : बद्रीनाथ यात्रा

जोशीमठ से तपोवन 

जोशीमठ से बद्रीनाथ जी 

बद्रीनाथ जी मंदिर

माणा : भारत का आखिरी गांव 

माणा से वसुधारा फॉल की ओर 

​वसुधारा फॉल :माणा 

वसुधारा से लौटते हुए !!

 

 

 

 

 

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