बुधवार, 29 अप्रैल 2015

पदमिनी​ महल : चित्तौड़गढ़


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सात द्वार पार करके मैं सीधा कालिका माई मंदिर चला गया। वहाँ नारियल चढ़ाना था। 2007 में कुछ माँगा था और उसका प्रतिफल मिलने के बाद अब नारियल चढाने का नम्बर था। चित्तौड़गढ़ के किले को बनवाते समय वहां के राजा ने इसके चारों तरफ बहुत मोटी और ऊँची दीवार बनवाई थी जिससे दुश्मन पास तक न आ सके और इसीलिए सात सात द्वार बनवाए गए थे और उनपर पहरेदार बिठा दिए गए थे लेकिन जो होना होता है होता ही है , अलाउद्दीन ख़िलजी ने चालाकी से इस पर अधिकार जमा लिया था 1303 में ! कोई कुछ नही कर पाया , न दरवाजे , न द्वारपाल , न इतनी ऊँची और मजबूत दीवार। हालाँकि ये व्यक्तिगत बात है लेकिन लिखना चाहूंगा। आदमी जब परेशान होता है तो वो हर उपाय ढूंढता है , भगवान को प्रसन्न करने की कोशिश करता है। इसी राह में 2007 में मैंने पत्नी के साथ कई मंदिरों की यात्रा करी और ये भी वचन लिया कि कार्य संपादित होने के बाद फिर से जरूर आएंगे। इसी क्रम में गोवेर्धन मंदिर मथुरा , कालिका मंदिर चित्तौड़गढ़ , सांवरिया जी चित्तौड़गढ़ , नीलकंठ ऋषिकेश , बद्रीनाथ और केदारनाथ उत्तराखंड , हेमकुंड की यात्राएं करनी हैं ! वैष्णो देवी की यात्रा कर चुके हैं।



चित्तौड़गढ़ की कहानी आगे बढ़ाते हुए : अलाउद्दीन ख़िलजी ने 1303 में इस किले पर आक्रमण कर दिया था और इसे जीत भी लिया था। असल में ख़िलजी का मकसद किला जीतने से ज्यादा रानी पद्मिनी को जीतना था और उन्हें अपने हरम का हिस्सा बनाना था। राणा रतन सिंह को जब अलाउद्दीन की इस भावना का पता चला तो उन्होंने भलमनसाहत ( या शायद युद्ध से डर के ) की वजह से अलाउद्दीन को दर्पण के द्वारा रानी पद्मिनी के दर्शन कराने के लिए तैयार कर लिया लेकिन हरामखोर अलाउद्दीन की नियत बिगड़ गयी और वो रानी पद्मिनी को दर्पण में देखकर उन्हें पाने के लिए लालायित हो उठा। और जब रना रतन सिंह शिष्टाचार वश अलाउद्दीन को दरवाजे तक विदा करने आये तो उसने राणा को बंदी बना लिया और रानी तक ये पैगाम भिजवाया कि राणा को तभी मुक्त किया जाएगा जब रानी पद्मिनी उसके हरम का हिस्सा बनने को तैयार हो जाएंगी। रानी पद्मिनी तैयार भी हो गयी लेकिन इस शर्त पर कि उन्हें बिलकुल छुपा के शाही तौर तरीके से परिवारीजनों के साथ ले जाया जाए। रानी पद्मिनी ने एक चाल चल दी और छद्म वेश में अपने 700 सैनिकों को अलाउद्दीन के पास भेज दिया जो राणा को मुक्त करा लाये। लेकिन अलाउद्दीन उनके पीछे लग गया और किले के मुख्य द्वार पर भीषण युद्ध हुआ जिसमें राणा रतन सिंह की मौत हो गयी जिसके परिणाम स्वरुप रानी पद्मिनी को अपनी सहेलियों और दासियों के साथ जौहर करने को मजबूर होना पड़ा।

जैसा मृदुला द्विवेदी कहती हैं , ये वास्तव में बहुत बड़ा किला रहा होगा कभी। लगभग 13 किलोमीटर की परिधि में फैले इस किले की एक एक चीज को गौर से देख पाना इतना आसान भी नही है। आप पहले पोल से ही कैमरा निकाल लें तो आखिर तक आप इतना थक जाएंगे कि मन करेगा अब बस।  कालिका माता के मंदिर के सामने ही कई सारी दुकानें सजी रहती हैं प्रसाद की , चुनरी की और घास की भी।  जी घास भी वहां बेचीं जाती है।  असल में वहां गायें बहुत हैं और अगर आप गाय को दान करना चाहें तो घास खिलाकर दान कर सकते हैं।  गाय भी खुश और आप भी खुश।  पांच रुपये की एक गड्डी और 10 रूपये की तीन गड्डी ।  ये दान सस्ता भी है और अच्छा भी।  कालिका माँ के दर्शन के पश्चात वहीँ सामने से एक रास्ता जाता है , मालुम नही कहाँ  ? लेकिन मुझे एक मंदिर दिखाई दिया सामने तो मैं उधर चल दिया।  मुश्किल से एक दो एक दो आदमी ही चल रहा होगा उधर।  एकदम  सुनसान सा रास्ता।  वो एक छोटा सा मंदिर था लेकिन कोई दिखाई नही दिया वहां , किसी महात्मा के कपडे सूख रहे थे।  शायद किले के मंदिर के किसी पुजारी का निवास स्थान  रहा होगा वो। 

वहां से लौटकर रानी पद्मिनी के महल की तरफ चल दिया। महल के चारों तरफ पानी भरा होता है। अंदर जाने की मनाही है लेकिन आप दूर से कितने भी फोटो खींच लें कोई रोकटोक नहीं। हाँ , महल के पास एक पार्क है। कहते हैं अलाउद्दीन ख़िलजी ने यहीं से रानी को सीसे में देखा था और उनकी सुंदरता पर मर मिटा था। इस पार्क का 10 रूपये का टिकेट लगता है। मुख्य कार्यालय से ही मिल जाता है , नही ले पाये तब भी कोई परेशानी नही। वहां टिकट चेक करने वाला आपसे 10 रुपया लेगा और अपनी पॉकेट में रख लेगा। और आपको अंदर जाने देगा ! 


आइये फोटो देखते हैं :​



कालिका माई मंदिर
कालिका माई मंदिर

कालिका माई मंदिर












​ये वो अट्टालिका जिस पर चढ़कर आप सीधे  पदमिनी महल को देख सकते हैं ​

​तीन मंजिल का पदमिनी महल , जिसके ताम्बे के दरवाज़ों को अकबर उखड़वाकर आगरा ले गया था

​​इसके चारों तरफ पानी रहता है ! इसी की नकल करके उदयपुर का जल महल बनाया गया था



कोई खण्डहर
कोई खण्डहर





                                                                                                      
                                                                                                                यात्रा ज़ारी रहेगी:

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

चित्तौड़गढ़ किला


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सांवरिया मंदिर के दर्शन करने के पश्चात तय हुआ था कि मैं अकेला चित्तौड़गढ़ किला देखने जाऊँगा और बाकी सब लोग चन्देरिया स्थित घर चले जाएंगे। खाना मैंने सबके साथ सांवरिया जी पर ही खा लिया था तो अब भूख की चिंता नही रही थी। अब बस चिरपरिचित किले को जिसे मैंने कम से कम 10 बार पहले भी देखा है , फिर से देखना था ! पहले मैं ब्लॉग नही लिखता था इसलिए ज्यादा फोटो भी नही खींचता था और जो थोड़े बहुत फोटो खींचता भी था वो पुराने कैमरे के हैं , उनका नेगेटिव बनवाओ फिर कॉपी निकलवाओ ! कितना झंझट वाला काम था और अब डिजिटल कैमरे ने बहुत आसान कर दिया सब कुछ ! थोड़ा पैसा तो लगता है लेकिन संतुष्टि उस पैसे से ज्यादा है !

मुझे चित्तौड़गढ़ में कचहरी चौराहे पर उतार दिया। वहां से आपको फोर्ट के लिए टेम्पो आसानी से मिल जाते हैं , आप चाहें तो पूरा टेम्पो हायर कर लें या फिर शेयरिंग में चले जाएँ। मर्जी आपकी है। मुझे क्या जरुरत थी हायर करने की ? 20-25 रूपये में शेयरिंग में जाऊँगा , क्यों बेकार 300 रूपये खर्च किये जाएँ ? आइये चित्तौड़गढ़ के विश्व प्रसिद्द और अब विश्व धरोहरों में शामिल "विजय स्तम्भ " की तरफ चलते हैं।

चित्तौड़गढ़ का किला क्षेत्रफल के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा किला माना जाता है। लगभग 280 हेक्टेयर में फैला ये किला 7 वीं शताब्दी में मौर्यंस ने बनवाया था। मेवाड़ की लगभग 834 सालों तक राजधानी रहा चित्तौड़गढ़ , पहले चित्रांगदा मोरी कहलाता था जो कालांतर में चित्तौड़गढ़ हो गया। इस किले ने तीन तीन बार आक्रमण झेले हैं और ये आक्रमण केवल लूट और सत्ता तक सीमित नही रहे बल्कि इन्होने "जौहर " के रूप में कई जिंदगियों को भी काल के गाल में पहुँचाया। पहला आक्रमण 1303 में अलाउद्दीन ख़िलजी ने किया तब राणा रतन सिंह की रानी पद्मिनी ने अपनी और साथी महिलाओं के साथ जौहर किया। ये मेवाड़ के इतिहास में पहला जौहर कहा जाता है। इसके बाद 1535 में गुजरात के शासक बहादुर शाह ने इस पर आक्रमण किया जिसके परिणामस्वरूप रानी कर्णावती को जौहर करना पड़ा। ये इतिहास में दर्ज़ आखिरी जौहर माना जाता है। लेकिन इस जौहर प्रथा ने कुल मिलाकर करीब 13000 महिलाओं और बच्चों की जिंदगी लील ली थी। और फिर 1567 ईस्वी में मुग़ल शासक अकबर ने इस पर आक्रमण कर दिया। इसके करीब 48 साल बाद जहाँगीर ने राणा अमर सिंह को ये किला वापस किया।

बेडच नदी के बाएं किनारे पर स्थित , लगभग 700 एकड़ क्षेत्रफल में फैले इस किले को सुरक्षित बनाने के लिए इसके चारों तरफ 4. 5 किलोमीटर लम्बी दीवार इस तरह से बनवाई गयी थी कि दुश्मन अंदर तक न घुस सके। इसके मुख्य प्रवेश द्वार से लेकर पहाड़ी पर स्थित महल तक पहुँचने के लिए 7 द्वार बनवाए गए थे जिन्हें राणा कुम्भा ने बनवाया। इन द्वारों पर हथियार बंद सैनिक हमेशा तैनात रहते थे। इन सात द्वारों के नाम इस तरह से हैं - पैदल पोल , भैरों पोल , हनुमान पोल , गणेश पोल , जोरला पोल , लक्ष्मण पोल और आखिर में राम पोल।


आइये एक एक करके सभी सात पोल पार करते हैं और ऊपर पहुँचते हैं।


पैदल पोल
भैरों पोल
हनुमान पोल
गणेश पोल
जोरला पोल

लक्ष्मण पोल
राम पोल













                                                                     
                                                                                         आगे यात्रा जारी रहेगी :

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

साँवरिया जी मंदिर :चित्तौड़गढ़


प्रस्तुति : योगी सारस्वत
दिनांक : 24 जनवरी 2015


उदयपुर की बेहतरीन यात्रा के बाद हमारा अगला इरादा चित्तौड़गढ़ के फोर्ट को देखना था , हालाँकि मैं यहां कई बार जा चुका हूँ किन्तु बच्चों के साथ कभी नही गया। चित्तौड़गढ़ में मेरी बड़ी बहन रहती हैं इसलिए चक्कर लगते ही रहे हैं लेकिन इस बार बात ही कुछ थी। 

उदयपुर से चित्तौड़गढ़ तक आने वाली पैसेंजर ट्रेन अपने निर्धारित समय पर चित्तौड़गढ़ पहुँच गयी थी , वहां से ऑटो लेकर सीधे दीदी के घर। उन्होंने अभी नई गाडी खरीदी है 15 दिन पहले ही और वो अभी इसे कहीं दूर लेकर भी नही निकले। जीजा जी ने प्रोग्राम में चेंज कर दिया। बोले सुबह पहले सांवरिया जी के मंदिर चलेंगे , फिर हम तुम्हें फोर्ट छोड़ देंगे। ये भी ठीक है।

चित्तौड़गढ़ से करीब 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सांवरिया जी का मंदिर राजस्थान में बहुत प्रसिद्द है। चार लेन का हाईवे नंबर 76 एकदम मक्खन जैसा बना हुआ है हालाँकि भदसौड़ा चौराहे पर नया आदमी भटक जाता है , वहां ऐसे गोल गोल से चक्कर बने हुए हैं कि आदमी कंफ्यूज हो जाता है।

मुख्य मंदिर रोड से करीब आठ किलोमीटर अंदर है और प्राकट्य स्थल बिल्कुल रोड के किनारे ही है। प्राकट्य स्थल के बराबर में से ही एक ऊबड़ खाबड़ सी रोड अंदर की तरफ जाती है। अभी काम चल रहा था उधर , ये जनवरी की बात है , अब शायद सही हो गयी हो। मुख्य मंदिर का प्रांगण बहुत बड़ा है और जिस दिन इस मंदिर का निर्माण पूरा होगा , एक बेहतरीन और शानदार मंदिर बनेगा। सांवरिया जी राजस्थानियों और गुजरातियों के घरों में बहुत ऊंचा स्थान रखते हैं ! साँवरिया जी मतलब कृष्णा जी ! ये इस बात से समझा जा सकता है , वहां इस तरह के वचन लिखे रहते हैं :


                                                  सेठों में सेठ सांवरिया सेठ
                                                  बाकी सब डुप्लीकेट !!


आइये फोटो देखते हैं और सांवरिया जी का ध्यान करते हैं !! 






​सांवरिया जी प्राकट्य स्थल






​सांवरिया जी प्राकट्य स्थल








​सांवरिया जी प्राकट्य स्थल



​सांवरिया जी प्राकट्य स्थल

​मुख्य मंदिर
​मुख्य मंदिर

​मुख्य मंदिर
​मुख्य मंदिर


तुर्रेदार मूंछें
हम साथ साथ हैं


















                                                                                                                                      यात्रा ज़ारी रहेगी :