गुरुवार, 20 जुलाई 2017

Nandikund-Ghiyavinayak Trek : Delhi To Ransi

राम राम मित्रो !!


एक नई पोस्ट लिखने जा रहा हूँ लेकिन उससे पहले कुछ और बात भी करना चाहता हूँ ! इस सीरीज में जो पोस्ट आएँगी वो विशुद्ध रूप से ट्रैकिंग की पोस्ट होंगी ! आज इस सीरीज की शुरुआत करते समय थोड़ा सा इमोशनल हो गया हूँ ! कारण कुछ ख़ास नहीं , बस आप सबका साथ और समर्थन है ! पीछे मुड़कर जून 2016 को देखें तो मैं एक छोटा -मोटा सा घुमक्कड़ , अनजान सा ब्लॉगर था ! था क्या , आज भी हूँ लेकिन इस एक वर्ष में थोड़ी पहिचान मिली है और आपका समर्थन भी बढ़ा है ! तो इस सबकी प्रेरणा निश्चित रूप से उन अनगिनत पाठकों और मेरे मित्रों से मिलती है जिन्होंने मुझे ट्रैकिंग से परिचित कराया और ट्रैकिंग करने का साहस दिया ! बहुत लोग हो सकते हैं लेकिन किसी एक का नाम लेना भी मुश्किल होगा ! फिर भी अपनी तरफ से अमित तिवारी जी , बीनू भाई का आभार व्यक्त करना चाहता हूँ जिनकी प्रेरणा से ही आगे बढ़ने की हिम्मत मिली ! ट्रैकिंग , असल में प्रसव पीड़ा की तरह है जिसमें शारीरिक और मानसिक कष्ट के बाद जो फल प्राप्त होता है वो अंततः आनंद और ख़ुशी से सराबोर कर देता है !! जून 2016 से लेकर जून 2017 तक यूँ खूब सारी यात्राएं हुईं और एक बार हिन्दी के अग्रणी समाचार पत्र "दैनिक जागरण " में सतोपंथ -स्वर्गारोहिणी का यात्रा वृतांत भी छप गया ! 900 रूपये भी मिले :-) ! 25 दिसंबर 2016 को प्रकशित हुआ था !! और सच कहूं तो यही यात्रा थी जिसने थोड़ी पहिचान दी और हौसला भी बढ़ाया कि जा योगी , अस्थमा को पछाड़ कर आगे बढ़ !! कल ही गुरुदेव श्री ललित शर्मा जी के माध्यम से एक समाचार पात्र में साक्षात्कार भी प्रकाशित हुआ है ! धन्यवाद आपका !!

इस यात्रा सीरीज में आप मध्यमहेश्वर मंदिर के दर्शन करते हुए , नंदी कुंड और फिर 5000 मीटर ऊँचे घीया विनायक पास को पार करते हुए बर्मा बुग्याल और मानपाई बुग्याल में मस्ती करते हुए , 8वीं शताब्दी के बंशी नारायण मंदिर को देखेंगे और फिर कल्पेश्वर मंदिर पर अपनी यात्रा खत्म होगी ! दो -तीन बातें कहनी हैं यहां ! ये यात्रा 15 जून 2017 को शुरू होनी थी लेकिन मेरे पापा की तबियत खराब होने के कारण एक दिन आगे बढ़ गई और 15 के बजाय 16 जून को शुरू हो सकी ! आप कह सकते हैं कि मुझे पापा की तबियत खराब होने की वजह से जाना ही नहीं चाहिए था , बिल्कुल ! आपकी बात सही है , लेकिन मैं अपने पापा के लिए भगवान से प्रार्थना करना चाहता था और मुझे यही तरीका बेहतर लगा ! पापा की तबियत अभी भी ठीक नहीं है , उम्र हो रही है तो रिकवर करना कठिन हो जाता है !!

17 जून की शाम को रांसी गाँव में अपने मित्र रविंद्र भट्ट जी के यहां पहुँच गए थे और फिर 18 जून से इस ट्रैक पर यात्रा शुरू कर दी ! आगे बढ़ने से पहले मुझे लगता है आपको पूरा कार्यक्रम ( itinerary ) बता दी जाए जिससे आपको मेरी बात समझने में आसानी होगी !

Day 0 : 16/06/2017 : 
Depart from Delhi ( Ghaziabad )​, Overnight Journey to Haridwar

Day 1 : 17/06/2017 : 

Haridwar to Kund to Ukhimath to Ransi (2100 Meter)
 * Talk to Porters , Shopping of Groceries, etc at Ransi

Day 2 : 18/06/2017 : 

Ransi to Nanu Chatti (2700 Meters , 8 Km distance)

Day 3 : 19/06/2017 : 

Nanu Chatti to Madhyamaheshwar Temple ( 3300 Meters , 10 Km) to Budha Madhyamaheshwar (3500 Meters , 2 Km)

Day 4 : 20/06/2017 : 

Budha Madhyamaheshwar to Rikhana to Dhola Khetrapal to Kachni Dhar (4200 Meters , 11 Km)

 Day 5 : 21/06/2017 : 
Kachni Dhar to Luntri Khark to Pandusera or Pandav Sera (4000 Meters , 10 Km)

Day 6 : 22/06/2017 : 

Pandusera to Nandikund (4500 Meters , 8 Km)
* Explore Nandikund and Nearby places

Day 7 : 23/06/2017 : 

Nandikund to Ghiyavinayak Pass ( 5000 Meters ) to Vaitarni to Kail to Burma Bugyal to Achri Kona to Manpai Bugyal (3900 Meters , 12 Km)

Day 8 : 24/06/2017 : 
Manpai Bugyal to Menghat to Khanddwari to Banshinarayan Mandir (4000 Meters , 12 Km) 
                 
Day 9 : 25/06/2017 : 

Banshinarayan Temple to Devgram (2200 Meters , 12 Km) Explore Dhyan Badri and Kalpeshwar  ( 4 km) to Chamoli (Hotel Stay)

Day 10 : 26/06/2017 : Chamoli to Haridwar to Delhi ( Overnight Journey) . 



तो हमारी यात्रा इस प्रोग्राम के हिसाब से आगे बढ़ती जायेगी ! इस यात्रा में आपको एक से एक नए स्थानों के बारे में जानने का अवसर मिलेगा , प्राचीन कहानियां मिलेंगी ! ट्रैकिंग में सबसे अच्छी बात ये है कि आप उन जगहों को देख पाते हैं जहां या तो कोई नहीं जाता या फिर गिने चुने लोग ही जाते हैं ! हमारे इस नंदीकुंड -घिया विनायक पास ट्रेक पर हमसे पहले सिर्फ 8 विदेशी लोग इस सीजन में गए एक ग्रुप में ! हमारे साथ , आगे -पीछे कोई नहीं था ! होगा भी नहीं , क्यूंकि अगला कोई एक ग्रुप सितम्बर में जाएगा ! हम भाग्यशाली हैं कि अपने दूसरे ट्रैक में ही लगभग 5000 मीटर की ऊंचाई तक जाकर सुरक्षित वापस आ गया ! सुरक्षित इसलिए कहा क्योंकि पिछली बार सतोपंथ -स्वर्गारोहिणी ट्रैक पर पैर मुड़ गया था और आखिरी पूरा दिन दर्द में कराहते हुए चलना पड़ा था ! खैर , आप सबके शुभेच्छाओं के कारण बिल्कुल सही और बढ़िया तरह से ये ट्रैक पूर्ण हुआ ! आगे की बात , अगली पोस्ट में !!














ये जो यहां फोटो दी गई हैं ये पूरी यात्रा से ऐसे ही चुनी हुई 10 फोटो हैं ! कोई सीरियल नहीं है , कोई कैप्शन नहीं ! अगली बार सब कुछ बताया जाएगा !!  :)

सोमवार, 17 जुलाई 2017

Places to visit in Jaisalmer

अगर आप राजस्थान की शाही हवेलियों के साथ साथ रेत के धौरे ( Sand Dunes ) भी देखना चाहते हैं , उसमें लोटपोट हो जाना चाहते हैं , बच्चों के साथ फिर से एक बार बच्चा बन जाने की ख्वाहिशें मन में हिलोरें मार रही हैं तो मैं कहूंगा कि जैसलमेर से बेहतर कोई स्थान नहीं ! दिल्ली से शाम पांच बजे की रेलगाड़ी पकड़िए और अगले दिन जैसलमेर पहुँच जाइये ! जबरदस्त जगह है लेकिन आपके पास कितना समय है , उस हिसाब से अपने घूमने की जगह तय करिये ! वैसे तीन दिन में बहुत कुछ घूमा जा सकता है ! तो आज की इस पोस्ट में आपको जैसलमेर की उन जगहों के बारे में बताता चलता हूँ जहां आप परिवार सहित जा सकते हैं ! हाँ , इस लिस्ट में कुछ वो जगह भी शामिल की हैं जहां मैं नहीं जा सका लेकिन आप जाने की सोच सकते हैं ! तो आइये , जैसलमेर के घूमने लायक स्थानों के विषय में पढ़ते हैं : 

 Sonar Fort : Jaisalmer 

जैसलमेर फोर्ट को सबसे पहले स्थान पर रखिये , उसका कारण ये है कि ये जैसलमेर की जान तो है ही , दूसरा आपकी ट्रेन दोपहर में जैसलमेर पहुंचेगी तो जैसलमेर से बाहर जाना मुश्किल होगा ! तो फ्रेश होकर , खाना -वाना खाकर निकल जाइये गोल्डन फोर्ट देखने ! रात 10  बजे तक खुला रहता है ! जैसलमेर फोर्ट , वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल है और दुनियां के सबसे बड़े संरक्षित किलों में से एक है ! जैसलमेर फोर्ट को 1156 ईसवी में राजपूत राजा रावल जैसल ने बनवाया था और उसी से इस शहर का नाम भी जैसलमेर हुआ ! और आप ये देख सकते हैं कि पूरा जैसलमेर शहर ही इस किले के चारों तरफ में बसा हुआ है ! जैसलमेर की धरती से करीब 30 मीटर ऊंचाई पर , त्रिकुटा की पहाड़ियों पर बना ये फोर्ट और ये शहर पुराने जमाने में "सिल्क रूट " से व्यापार करने वालों के लिए एक स्टे पॉइंट हुआ करता था ! इस क़िले का पत्थर ऐसा है कि जब इस पर सूरज की किरणें पड़ती हैं तो इसका रंग सोने जैसा चमकने लगता है , इसीलिए इस किले को "सोनार क़िला " या Golden Fort कहते हैं !



Patwon ki Haveli : Jaisalmer

जैसलमेर का किला घूमने के पश्चात आप पटवा हवेली जा सकते हैं लेकिन ध्यान रहे , ये हवेली 6 बजे बंद हो जाती है तो या तो आप पहले यहां घूम आएं उसके बाद गोल्डन फोर्ट देखने जाएँ या फिर इसे अगले दिन के लिए टाल दें और जैसे ही आपको दो घंटे का समय मिले , यहां हो आइये !​जैसलमेर में "पटवों की हवेली " जैसलमेर की सबसे बड़ी हवेली मानी जाती है ! ये वास्तव में एक हवेली नहीं है बल्कि पांच हवेलियों से मिलकर बनी है जिसमें पहली "कोठारी की पटवा हवेली " सबसे ज्यादा आकर्षक और प्रसिद्ध है ! दूसरी बात ये कि ये हवेली जैसलमेर की सबसे पहली हवेली है जिसे सन 1805 में गुमान चंद पटवा ने बनवाया ! गुमान जी बड़े रईस थे और उन्होंने अपने पाँचों बेटों के लिए हवेलियां बनवाई जिन्हें पूरा होने में 50 साल लग गए ! इस हवेली में कई तरह के ताले ( Locks ) और राजस्थानी पगड़ियां देखने का मौका मिला ! इस हवेली की दीवारें राजशाही होने का सबूत देती हैं !




Sam Sand Dunes : Jaisalmer 

​अगले दिन सुबह या शाम को सम सैंड डून्स में मजे करने का समय निर्धारित करिये  ! हालाँकि सम जाने के लिए सबसे बेहतर समय सनराइज के समय या फिर शाम को सनसेट के समय है लेकिन हमारी व्यवस्था इन दोनों समय में नहीं बन पा रही थी इसलिए लगभग दोपहर में ही जा पाए ! जैसलमेर से 42 किलोमीटर दूर सम गाँव डेजर्ट सफारी के लिए बहुत प्रसिद्द जगह है , हालाँकि अब खुड़ी और घनाना भी डेजर्ट सफारी के लिए बढ़िया और मजेदार पॉइंट बन रहे हैं , लेकिन इन जगहों तक परिवार के साथ जैसलमेर से पहुंचना मुझे थोड़ा असुविधाजनक लगा इसलिए हमने सम को ही चुना ! फिर कहूंगा कि अगर आपके पास समय और धन की दिक्कत नहीं तो आप खुड़ी जाएँ , ज्यादा अच्छा रहेगा ! सम में लेकिन आप परिवार के साथ आराम से जा सकते हैं और लौटते हुए दूसरी जगहों को भी देख के , घूम के आ सकते हैं ! सम, जैसलमेर के चारों तरफ फैले "थार रेगिस्तान " को देखने और घूमने का बढ़िया स्थान है ! हनुमान सर्किल से आपको शेयर्ड जीप या SUV मिल जाती हैं लेकिन थोड़ा इंतज़ार करना होगा , या फिर आप अपनी गाडी लें ! सम तक का किराया शेयर्ड गाडी में 100 रूपये तक लग जाता है प्रति सवारी और अगर आप रेंट पर लेकर जाना चाहते हैं तो कम से कम 600 -700 -800 तक लग सकता है ! बेहतर है रेंट पर ही गाडी ली जाए !


 Kuldhara : A Haunted Village 


जैसलमेर शहर से दक्षिण -पश्चिम दिशा में करीब 18 किलोमीटर दूर कुलधरा गाँव एक भुतहा (Haunted ) गाँव माना जाता है ! भुतहा कैसे हो गया ये गांव ! इस पर अलग अलग लोगों की अलग अलग कहानियां हैं ! कोई कहता है कि पानी की बेतहाशा कमी की वजह से ये गांव धीरे धीरे खाली होता चला गया और फिर जब ये पूरा गांव खाली हो गया तो यहाँ भूतों ने अपना डेरा जमा लिया ! उधर दूसरी कहानी भी सुनने को मिलती है जो ज्यादा सटीक बैठती है ! उस कहानी को हालाँकि सालिम सिंह के लोग , उनके वंशज ख़ारिज करते हैं ! लेकिन वो कहानी है क्या ? ये जानना भी तो जरुरी है !


Lodurva 

 

लोद्रवा , जैसलमेर से 15 किलोमीटर दूर बहुत छोटा सा गांव है लेकिन यही गाँव 1156 ईस्वी तक रावल की राजधानी हुआ करता था और फिर जब रावल ने जैसलमेर बसा लिया तो राजधानी भी जैसलमेर हो गई ! खैर , इसके अलावा लोद्रवा 23 वे जैन तीर्थंकर पार्शवनाथ जी के मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है ! इस मंदिर को 1152 ईस्वी में मुहम्मद गोरी ने तोड़ दिया था लेकिन फिर बाद में व्यापारी थारू शाह ने सन 1615 ईस्वी में फिर से बनवाया और फिर और भी बेहतर बनता गया ! इसके अलावा ऋषभनाथ जी और सम्भवनाथ जी के मंदिर भी देखने लायक हैं ! इसके थोड़ा पीछे की तरफ माता हिंगलाज देवी का मंदिर है ! हिंगलाज माता का असली मंदिर पाकिस्तान के कराची में है लेकिन वहां जाना लगभग असंभव है हमारे लिए , इसलिए यहीं दर्शन कर लेते हैं ! 

 

Heritage Walk of Gadisar Lake : Jaisalmer 

 

गड़ीसर लेक , एक कृत्रिम जलाशय ( Men  Made ) है जिसे 14 वीं सदी में राजा महरावल गड़सी ने बनवाया था और संभवतः वहीँ से ये नाम आया होगा , गड़ीसर लेक ! यही लेक कभी जैसलमेर के लिए पानी सप्लाई का मुख्य स्रोत थी और आज जैसलमेर का बढ़िया टूरिस्ट पॉइंट बन चुकी है ! बोटिंग के साथ साथ यहां के घाट और मंदिर भी सुन्दर लगते हैं ! लेक के आसपास बहुत सारे पक्षी देखने को मिलेंगे जो शायद "भरतपुर बर्ड सेंचुरी " जाते हुए या आते हुए यहां "स्टे " करते हैं ! जहां से गड़ीसर लेक हेरिटेज वाक  शुरू होता है वहीँ रोड के दूसरी तरफ राजस्थान सरकार का लोक संगीत केंद्र भी है जहां "पपेट शो " होता है ! इसका शो शाम 7 बजे शुरू होता है , मौका मिले तो देखिएगा जरूर , अच्छा लगेगा ! 


Jaisalmer War Memorial : Jaisalmer 

 

तो अब तय हुआ कि जैसलमेर से लगभग 10 किलोमीटर दूर , जैसलमेर -जोधपुर रोड पर स्थित भारतीय सेना के गर्व के क्षणों को परिभाषित और प्रदर्शित करने वाले "जैसलमेर वॉर मेमोरियल ( JWM) " को देखने और अपने सैनिकों की महान वीरगाथाओं से परिचित होने चलते हैं !  जैसलमेर वॉर मेमोरियल ( JWM ) भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास और भारतीय सैनिकों की वीरगाथाओं को प्रदर्शित करने का एक ऐसा स्थान बन गया है जहां आपका सीना गर्व से 56 " का हो जाता है ! 24 अगस्त 2015 में तैयार हुआ ये म्यूजियम 1965 के युद्ध की Golden Jubilee के रूप में भी देखा जा सकता है ! यहां इंडियन आर्मी हॉल और लोंगेवाला हॉल नाम से दो हॉल हैं जिनमें इंडियन आर्मी के जवान और अधिकारियों की वीरगाथाएं प्रदर्शित की गई हैं ! यहाँ परमवीर चक्र और महावीर चक्र विजेताओं के नाम उनकी तस्वीरों के साथ लिखे गए हैं ! पास में ही एक हॉल है जहां 20 मिनट की एक फिल्म चलती है भारतीय सेना के वीर जवानों की बहादुरी के किस्से दिखाती है ये फिल्म ! 20 रूपये का टिकट है और हाँ एक Souvenir Shop  भी है जहाँ से आप भारतीय सेना के प्रतीक चिन्ह जैसे Cap , Key Rings  , T-Shirts  , Stickers खरीद सकते हैं ! 


Salim Singh ki Haveli : Jaisalmer 

 

सालिम सिंह का पूरा नाम सालिम सिंह मेहता था जिन्होंने 1815 ईस्वी में इस महलनुमा हवेली का निर्माण कराया ! वो उस वक्त अपने राज्य "जैसलमेर " के दीवान मतलब प्रधानमंत्री हुआ करते थे ! आप इतिहास देखेंगे तो एक अंदाजा लगेगा कि मेहता नाम से कई लोग उस वक्त के शासक महारावल के प्रधानमंत्री रहे हैं , तो ऐसा कहा जा सकता है कि सालिम सिंह भी उसी फैमिली से आये होंगे ! सालिम सिंह का सम्बन्ध लोग कुलधरा गाँव की बर्बादी से भी जोड़ते हैं और ऐसे कहते हैं कि इन्हीं सालिम सिंह के अत्याचारों और इनकी पालीवाल ब्राह्मणों की लड़की पर बुरी नजर के चलते ही कुलधारा गाँव एक ही रात में वीरान हो गया था। हालाँकि सालिम सिंह के परिवार के लोग ( वंशज ) इस बात को स्वीकार नहीं करते ! सच क्या है -भगवान जाने !  

​अब कुछ वो जगह जहां मैं जाना चाहता था लेकिन समय अभाव के कारण नहीं जा पाया ! आगे के दो स्थान का विस्तृत विवरण और फोटो आदरणीय श्री हर्षवर्धन जोग जी के ब्लॉग से दे रहा हूँ 

 Tanot Mata Mandir :

 

 तनोट एक छोटा सा रेगिस्तानी गाँव है जो जैसलमेर शहर से लगभग 150 किमी दूर है. यहाँ से अंतर्राष्ट्रीय सीमा लगभग 25 किमी है. यहीं एक विख्यात मंदिर है श्री तनोट माता मंदिर. कहा जाता है कि हिंगलाज माता का ही रूप तनोट माता हैं और तनोट माता का दूसरा रूप करनी माता हैं. हिंगलाज माता का मंदिर कराची से 250 किमी दूर बलोचिस्तान में हिंगोल नदी के किनारे है और करनी माता का मंदिर बीकानेर जिले में है.

भाटी राजपूत राजा केहर के पुत्र तन्नू राव तनोट माता के भक्त थे और उन्होंने विक्रमी सम्वत 828 याने सन771 में मंदिर की स्थापना की थी. मंदिर का नाम और मान्यता 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद बहुत बढ़ गई. तब से तनोट मंदिर हर जैसलमेर आने वाले पर्यटक की लिस्ट में शामिल हो गया है.

इस मान्यता की कहानी कुछ इस प्रकार है कि 1965 में तनोट के तीन ओर से पाक सेना ने भारी आक्रमण किया. तनोट की सुरक्षा के लिए 13 ग्रेनेडियर की एक कंपनी और BSF की दो कम्पनियाँ थी जिसके मुकाबले दुश्मन की ब्रिगेड थी ( एक कम्पनी में आम तौर पर 100 से 300 जवान हो सकते हैं और एक ब्रिगेड में 1000 से 3000 तक ). कहा जाता है कि तनोट और उसके आसपास 3000 बम गिराए गए जिनमें से 20% तो फटे ही नहीं और ज्यादातर सुनसान रेगिस्तान की रेत में फटे जिससे जान माल का कोई नुक्सान नहीं हुआ. 450 गोले मंदिर परिसर में या आसपास गिरे पर फिर भी मंदिर का कोई नुकसान नहीं हुआ. इससे सैनिकों में और जोश भर गया और मनोबल ऊँचा हो गया. तीसरे दिन पस्त दुश्मन की बैरंग वापसी हो गई. 1965 के इस युद्ध के बाद मंदिर का इंतज़ाम BSF ने ले लिया.


Bada Bagh :

 

शहर से 6 किमी दूर बड़ा बाग़ है जिसे महारावल जय सिंह, द्वितीय ने सोलहवीं शताब्दी में बनवाया था. कहा जाता है की आम जनता की राहत के लिए राजा ने पानी का तालाब बनवाया और आसपास बाग़ लगवाया. 21 सितम्बर 1743 को महाराजा जय सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र ने पास वाली पहाड़ी पर पिता की याद में छतरी बनवा दी. उसके बाद राजघराने के कई लोगों की छतरियां या स्मारक या cenotaph यहाँ बनाए गए. गाइड द्वारा बताया गया कि इन छतरियों की कुछ विशेषताएं हैं:
-  सभी छतरियां स्थानीय पीले पत्थर की बनी हुई हैं. जो छतरियां पिरामिड-नुमा हैं वो हिन्दू कारीगरों द्वारा बनाई गई हैं और गोल गुम्बद की तरह छतरियां मुस्लिम कारीगरों द्वारा बनाई गई हैं.

- हर छतरी के नीचे तीन चार फुटा एक खड़ा पत्थर लगा है जिस पर घोड़े पर बैठे हुए राजा की नक्काशी है और साथ ही संक्षिप्त जीवनी लिखी हुई है. राजा के पत्थर के साथ एक पत्थर पर पटरानियों और तीसरे पत्थर पर छोटी रानियों के बारे में लिखा हुआ है.

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

Salim Singh ki Haveli : Jaisalmer

इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करिये !



अभी जब हम जैसलमेर वार मेमोरियल से निकले हैं तो दोपहर के 12 बजने वाले हैं , इसका मतलब अभी हमारे पास 4 घंटे तो बचते ही हैं ! हमारी ट्रेन 5 बजे की है ! आज 29 जनवरी है दिन रविवार ! तो आज जो अभी समय अपने पास है , इसका उपयोग कैसे किया जाए ? बड़ा बाग़ दूर पड़ेगा , सालिम सिंह की हवेली देखने चलते हैं ! सही रहेगा , क्योंकि उधर ही होटल से अपना बोरिया -बिस्तर भी उठाते लाएंगे ! जैसलमेर फोर्ट के पास ही है सालिम सिंह की हवेली ! तो अब JSM से विदा लेते हैं और चलते हैं , कहाँ ? सालिम सिंह की हवेली ! ज़ालिम सिंह मत पढ़ना भाई लोगो , नहीं तो मुझे उनके परिवार वाले मारेंगे बहुत :) लेकिन जाने से पहले ये जान तो लें कि कौन हैं ये साहब ? क्या बेचते थे , कहाँ रहते थे !! है कि नहीं !! भाई आप उनके घर में जा रहे हो , तो थोड़ा परिचय तो होना ही चाहिए !! तो जी पहले उनके बारे में पढ़ लो :



सालिम सिंह का पूरा नाम सालिम सिंह मेहता था जिन्होंने 1815 ईस्वी में इस महलनुमा हवेली का निर्माण कराया ! वो उस वक्त अपने राज्य "जैसलमेर " के दीवान मतलब प्रधानमंत्री हुआ करते थे ! आप इतिहास देखेंगे तो एक अंदाजा लगेगा कि मेहता नाम से कई लोग उस वक्त के शासक महारावल के प्रधानमंत्री रहे हैं , तो ऐसा कहा जा सकता है कि सालिम सिंह भी उसी फैमिली से आये होंगे ! सालिम सिंह का सम्बन्ध लोग कुलधरा गाँव की बर्बादी से भी जोड़ते हैं और ऐसे कहते हैं कि इन्हीं सालिम सिंह के अत्याचारों और इनकी पालीवाल ब्राह्मणों की लड़की पर बुरी नजर के चलते ही कुलधारा गाँव एक ही रात में वीरान हो गया था। हालाँकि सालिम सिंह के परिवार के लोग ( वंशज ) इस बात को स्वीकार नहीं करते ! सच क्या है -भगवान जाने !

ये हवेली करीब 200 साल पुरानी है और बड़ी यूनिक स्टाइल में बनाई गई है ! इसकी छत को नाचते हुए मोर का रूप दिया गया है ! बड़ी बात ये है कि इस हवेली को बनाने में सीमेंट का बिलकुल भी उपयोग नहीं किया गया है , बल्कि पत्थरों को इस तरह से interlock किया गया है कि वो बिल्कुल फिक्स हो जाते हैं ! बढ़िया आईडिया था उस समय का ! सिविल इंजिनीरिंग का बेहतरीन उपयोग ! मुझे बहुत ज्यादा समय पत्थरों को और उन्हें interlock करने के तरीके को जानने में ही लग गया ! यहां 20 रूपये प्रति व्यक्ति टिकट लगता है और कैमरा भी ले जा सकते हैं लेकिन इसका भी टिकट लगेगा ! ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं आती यहाँ इस हवेली को देखने ! लेकिन 20 रूपये में बुरी जगह नहीं है देखने के लिए ! सुबह से शाम 6 बजे तक खुली रहती है देखने के लिए ! अब ज्यादा कुछ नहीं है , बताने और लिखने को ! तो अब चलते हैं , लेकिन हाँ एक बात बताता चलता हूँ कि अगर आपको जैसलमेर और आसपास साइकिल से घूमने का मन हो और आप साइकिल किराए पर लेना चाहें तो " नाचना रेस्टारेंट " के सामने नारायण सर्किल से साइकिल किराए पर मिल जाती है ! मेरा मन था तनोट जाने का लेकिन समय की बंदिश भी कुछ होती है ! अगली बार जल्दी ही तनोट जाएंगे , और साइकिल से ही जाएंगे , राजस्थान का पूरा लुत्फ़ लेते हुए ! तनोट के लिए बस सुविधा की जानकारी तो मैं आपको पिछली में दे ही चुका हूँ , दोबारा बता देता हूँ कि तनोट की बस जैसलमेर से शाम 4 बजे निकलती है और रात को तनोट में ही रूकती है और फिर सुबह 7 बजे तनोट से जैसलमेर के लिए चलती है !!

चलो , अब सामान उठाते हैं और स्टेशन चलते हैं ! लेकिन अभी तो तीन बजे हैं बस , बहुत देर है यार ट्रेन निकलने में ! तो स्टेशन के पार्क में बच्चों को एन्जॉय करने देते हैं और हम मस्त कुछ तूफानी करते हैं :) कुछ नहीं यार - Thums Up पीते हैं !!

चलें अब , दिल्ली पहुंचना है और कल सुबह तक गाज़ियाबाद भी पहुंचना जरुरी है ! नौकरी का सवाल है रे बाबा !! नौकरी नहीं करूँगा तो बच्चे कैसे पालूंगा और फिर घूमी घूमी कैसे होगी !! :) :)

तो राम राम !!


पानी इकठ्ठा करने का कोई सिस्टम है ( Used for water collection )
Tiles of that Time
जैसलमेर फोर्ट को यहां से देखा जा सकता है( Outside walls can be seen of Golden Fort from this Haveli)



Initially , it was in shape of Dancing Peacock
नाचते हुए मोर की शक्ल दी गई थी इस छत को , अब तो ऐसी नहीं लगी मुझे ?
These types of  Flowers are erected in this Haveli without use of Cement



                                           काश !! मैं भी जैसलमेर का महारावल होता और मेरी रानी इस बालकनी में बैठी बाल बना रही होती और गाना बजता , कुछ दूर चलते ही.........................   :)


These Stone Flowers are erected with Hooks only


एक और बालकॉनी !! ये आपकी वाली रानी के लिए है , मेरी तरफ से gift   :)




पत्थर को गौर से देखिये , इसमें जो आगे चोंच निकली है वो इसे जोड़ने के काम आएगी


पत्थर को गौर से देखिये , इसमें जो आगे चोंच निकली है वो इसे जोड़ने के काम आएगी












तेज धुप है!!
 पत्थर ऐसे भी जुड़ते हैं
सालिम सिंह की हवेली






Waiting to be open a day !!



रेलवे स्टेशन पहुँच गए , वापस दिल्ली

रेलवे स्टेशन पहुँच गए , वापस दिल्ली!! बाय बाय जैसलमेर !!



                                                                                                 आगे जारी है  :